श्री शरद्य दैव सथ( दिवजी के दर शवान से. शष्ट नामक श्रद्‌ चन्दर प्रहण दैः समय तो पृथिवी की छाया मे ओर सूयं ग्रहण फेः समय चन्द्रपा के विम्य मे धवे कर जावा ह! धमी ल्यि पुसण व्यद धर्म दस्त मे श्रहण का कारण राष्ट मानकर उस निमित्त शमन दान अषप वप हवनादि षटरने से यद्य पुन्य हनि का पिधान खटा च्छित घर्णन करदे!

पदाथ धिया फे सिद्धान्तायसार अरहणक्र समय सूर्यचन्द्र ओर पृथिधी फी जो पक प्रकार की एक दूसरे के साथ माक पेण शक्ति था विद्युत्‌ दकि दै उस मे कुछ अन्तरः पटू जाता भिसफे कारण जगन्‌ मे भी सनेक भकार का परिवर्तेन दो जाता है परन्तु (कख धक्छार फे श्र्दण फे समय किंस श्रकार का परिः यर्त॑न होगा शस्ता क्नान सर्वं साधारण को हो जानै-के लिये परो- पक्षसी महर्पियोनि नेक णर मे बहुत विस्तार से वर्णन कय ह! परन्तु आल के निख्यमी मनुप्यों के लिये उन अलभ्य भ्रन्थो का एकत्र करना ही महान्‌ दुखैम हितो फिर उन मदान्‌ चिष्यो से युक्त अनेक ग्रन्थो मे से प्रदण से ्लम्बन्ध रखने वारं समग्र विष्यो दौ को छंटकरः ष्क कर, ठेना कितना दुर्दम दै? यद्ट वात किसर छिपी दुरं नटीं है! श्स्याटिये अने अनेक प्राचीन घ्रन्थों षा माररूप “इदष्य मार्कण्डः नामन्छ पकः महान्‌. विस्तृत श्रन्थ सरल आये माधा शीका सदित निर्माण किया टे। चष्ट श्रन्थ सोकोपकारार्थ अंक अंक रूपसे श्रकाश्धित किया जाता है मे सर्वतो भद्रचक्र (भरोकय दीपक )' ^दृषि भरवोध (भार्तका घायु शाख) भौर "संक्रान्ति भरकाश्च' मामकः तीन अक तो प्रधप्र पारित क्रिये जा चुके उसी भकार य्‌ श्रदण निबन्ध) नामक योया अदः मौ भ्रकादित कनेक लिथि तीन मानौ

"तदेके मद्रचक्रः तथा टे प्रोष नापक्र अक ती प्रसराशिव हेत ही हाधोदष्य विक गये पन्न्तु ब्राहृ की माग दिन फररिन यदत हाग्‌ शरमाल्यि दृष्ट प्रमो को पदिठे ते मौ भधिक्र षडा दूी धरार पव्या हे जो धोद दिगोमे सव प्रादय की सेशामेमेनौ जाकी! क्रामति अकायः कौभी सूदो निनो प्रतिये केष हैवे भौ सौप्रंषहो विक जामी)

मनै वनाया हन मे श्रहण ने का पुख्य तथा गौण कारणः, उसक्रि जानने के गौण तथा सस्य उपाय गौर इस फे स्पदौ म- ध्य-मोक्ष-स्थिति तथा विभ्वे आदिं का यथावन्‌ ज्ञान फुछ भी गणित किये चिना सहज दी फेवल दो चार अक मिलनेष्ीसे ह्यो जाने का सरु विधान तो गणित के सिद्धान्तसे श्रहणक्षान युर्पैण' नामक भागमे, अरण फे निमित्त से जगत्‌ मे होने वि अनेकः प्रकार के श्रुमाद्युम फो का विधान फलित के सिद्धान्त से रहण फल दर्पणः नामक भाग मे ओर रहण के सम्य खान दात, जष-तप, दवन, तथा अनिष्टकारकं ग्रहण की शान्ति शद फा विधान ध्म शाखो के सिद्धान्त से श्रहण पुण्य दपणः नामक मागमे किया गथा है। इन मे से यदह श्रहण फट दुरपण' नामक भाग प्रथम शरकारशितत किया जातत हमर विपय का रेस विस्त श्रन्थ आज तक कदीं मी प्रकादित नहीं हु्राहै। इस कौ देख कर यदि पाटक। की द्च्छा उन शरण कल दर्पणः तथा श्ररणं पुण्य दपणः नामक भागोके देखनेकी दुर तोवे दोन माग मी शीघ्र ही प्रकाशित कर दिये जार्येगे।

१९.७० | पण्डित भीगाखाल व्याम) चैत्र छदि पाटी (भारवाड़ )

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हमे यहा की पुस्त प्रादित हेते तो देर ल्गती ट। ग्नि विक्रीहोत क्क भी दे नहो ठगती अतः नो लोग मगनेमे कणत उनके हाथ पुलक अनि ते दूनी आवृत्ति छने तङ्‌ यन्द पतान परता

है इषौ ते मरि यज की पुस्तकों की उपयोगिता 8 पारक सुः जा ही जान

सूचीपत्र

> -- प्रकरणं विषय. भद्गराचरण म्रहण निर्णय $

३भ्रदणदहोने फा मुख्य कारण ग्रहण स्डमी फट प्रकरण

(१) स्वामि निर्णेय ... (र) श्वापि क्तात ... (२) व्रह्मा स्वामि फल (४) चन्द स्त्रामि फल (५) चन्द्र स्वामि फल (६) कवेर स्वापि फट (७) षरुण स्वामि एल (<) आधे स्वापे फल (९) यम स्वामि फर (१०) स्वापि रहित पर्वं घल अयन फ़ल प्रकरण (१) उत्तययण फल. (२) दक्षिणायण फल... मास कल प्रकरण „.. (१) कार्सिक मास फल (२) मृमदिर मास फल (२) पीप माख कट... (४) माध भास कल... (५) काल्यन मास फ़ल (&) चत्र मास फल (5) यैर्न मास फल (<) ज्येष्ठ मास फल

3

१५ ११ १३ १४ १५ १६

१७ १८

६९ २० # रर्‌ २४ स्व २६

चकरण. विषय. पुच्र, ग्छोक. र) आपाद भख 5 „+ (१०) श्रावण मास फल = रद (१९) भाद्रपद मास फट 3 3 २९. (१२) आश्विन मास फल मः ॐ, 39 (१३) मास विपे फर = „+ ३९ (९७) सूयै प्रण विष माष कर .„ १० ३२ (१५) चन्द्र श्रहण विरोप मास फक „. „+ ३३ (१६) अधिक मास फल $ „+ ३४

वार फल घकफरण ५४ = ` (१) रविवार फट ,, 4- रबद (२) चन्द्र यार ५6 ~." 3 (र) भद्ध वार फर... कन + १७ ८) चुघ वार फट ““ धि ५9२ 9 श्ल (५) शुर घार फट .. .“ १२ ३९ (६) शकर वार ..* = „+ ४५ (७) शनि घार फट .. ^ ४९ (<) सय श्रदण विदाष वार फल = (९) चन्द्रं प्रहण विशेष वार फल १३ ५०

मक्छत्र फक प्रक्छस्ण ... [1 ५१५ १४ (९) मभ्विनी नक्षत्र फल = + ५६ (र) भरणी नक्षत्र फल ~ „+ ५७ (ड) श्त्तिका नक्षघ्र फल # 4 ८७) रोहिणी नश्वर फट | ^ + ~व ) शुषि चन्न फलः ~ ९५ ६० (६) आद्र नक्षत्र फल धि = » १९१ (७) पुनच॑ु नक्षमन फट +. ईर (2) एष्य नक्षत्र कल = १६ ६३ ८९) अच्छा नक्षत्र कल < = + ९४

प्रकरण. ˆ` विषय. (१०) मधा नक्षत्र कठ."

(११) पवौ फाल्णनी न्त्र = ^ (्र)* उत्तय फाल्गुनी नक्ष

(१३) हस्त नक्षत्र फल ` (४) चित्रा नक्षत्र फट (१५) ` स्वाति नक्षत्र फल

(१६) विद्याखा नक्चत्र फट ^“ (९७) अनुराधा नक्षत्र फट (१८) ज्येष्ठा नक्षत्र फल (९९) मूल नक्षत्र फट (२०) पूवौपादा नक्षत्र फट „^ (२९) उत्तराषाढा नक्षत्र फल (२२) श्रवण नक्षत्र फल (रर) धनिष्ठा नक्षत्र फल (२) छखतमिषा नक्षत्र फट „^^ (२५) पू्ौभाद्रपदा मक्षप्र फल .. (२६) उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र फट (२७) रेषती नक्ष फट (2

ˆ पृष्ठ. कलो.

(२ॐ नक्षश्च बरा से धान्यादि की तेजी मन्दी.

(८) से भ्रण नक्षप्र फर „“.

९, मक्षत्राचुसार कूर्मं चक्रोक्त दश्च फट प्रकरण.

१५ व्राह्मणादि जाति नश्च धकरण १९ नक्षश्राजुसार मण्डल फलं परकरण

0) मण्डर ज्ञान ,.“ (२) वायु मण्डल फल अग्नि मण्डलः फल ७) षसण मण्डल फल 1

(५) महीन्द्र मण्डल फट

` @& षाय आदिं मण्डलो का फल पाक फाल

६५ ६६ ६७ ६८ ६९. ७> ७८ ७२ ५३ 1.11 ७५ ७६ ७७ ७९ ८४ ९५ ९१ ९७ १५० १०१ १०३ १०४ १९५ १०६ १०७

प्रकरण. विषय. पृष्ठ. श्छोषफ, (&) मण्डलो की श्रान्तिं करने की आवद्यकता 5 योग पठ प्रकरण -.. +. (९) विष्कुम्भ योग फल र) श्रीति योग फट (1 (३) आदुष्मान्‌ योग फल .(४) श्मोमाग्य योग फल 1 (५) हेमन्‌ योग कट 3 (&) अति गण्डयोग फल ¢ (ॐ) स्वुकमौ योग करु 1 (<) धृति योग कख... वि 0 (९) शूल योग फल,.* ०: (९०) गण्ड योग फल... 4 नि (१२) श्ुव योगं फल „^. ^ (१३) भ्याघात योग त; (१४) दषण योग कल 3 4 (१५) घञ्न योग फट ,, व, (९९ न्द योग कल (९७) व्थातिषात योग फर (१८) वरियाण योग फल 1 (१९) परिध योग फल (०) शिच योग कड . 0 (२९) सिद्धः योग रक ६. 0 (र) साध्य योग फल 4 (ररे) शुम योग फक ॥ि (4 (१४८) शुद्ध योम करः 4 (२५) ब्रह्म योगं फर (२९ णेन्द्र योग पतल ` १९ ˆ

(२७) वैधृति थोग फल # ५» १४५

धकरण. विषय. पृष्ठ. छक.

१३ रि फल प्रकरण --. 9 34 (द) मेष रादि दः "2: ६३ (२ दृष रशि फट ~^ + + ३७ (३) मिथुन राशि फट "~ "4६ ध) ककः राशि कछ 5 =“ 8६ १३९ ५) सिह यचि कर „+ १४३ (६) कन्या रादि फल ५» १४१ (७) वैल्य यकि फट पा ~ ३७ ण्णर्‌ (<) चुश्चिक राशि कट ~ » ४३ ८) धन ररि फट + थ्य (१०) मकर यादि फर (९९) कम्म याशि फल कर ~ 2 १४६ (१२) भीन राक्ि कट १४७ (१३) यदि वराते हरक वस्तु की तेजी मन्दी ६४८

(२७) नीख रारि स्थित चन्द्र 'प्रहणं „५ ३९ २४९ ९४ स्वोदा (आका साय) फल धकरण „~ „+

(१) खादय निर्णय ... „+ १५० (र) भ्रयम्र साद्य फल 9 „+ १५१ (६) द्वितीय सरद ति . ४० १५३ (७) नृतीय वोर फर = ५४ (५) चतु खांश = (६ पञ्चम श्वोंश फट ५० ०० १५६ (७) षट आांरा फल ~ ४१ १६० (<) सक्षम स्वस करु २६९१ {= प्रन्यान्तर् से मच संदा फल (६२ (१०) » मध्य स्तांरा फल + १६३ (९९) * अन्त्य खादर फल ~ ४२ ६४ षर) » सन्प्या कार कठः „= रष

६३) मोश्च समय खोरः फल „^ „» ६६

प्रकरण. षपिषय.

१५ ग्रस्त्ेद्य, श्रस्तास्त, ग्बद्र कलः प्रूरणः. (९) खय चन्द्र ग्रस्तोदय फल -“- (२ सूये प्रस्तोदय ब्रस्तास्तं फल 2) च्रं प्रस्तोदय ग्रस्तास्ते फट

(४) खप्रास फल .. (५) सग्रास पाप दाशि कल १६ दिका फट प्रकरण ... (१) दशान कोण फल (र) पृ दिशा फर (३) अपन कोण फट (४) दुक्षिण दिशा कठ (५) नैन्र्त्य कोण फल (8) पश्चिम दिशाफल (७) वायव्य कोण फट (<) उत्तर दिशा फट १५७ प्रास फट प्रकरण -..

(१) दद्रा प्रकार प्रास निण्य

(२) सव्य प्रास फट (£) जप स्तव्य त्रास क्ट (४) खष् श्रा फक ..“ ८) अचस्षन गास फर (६&) नियेषठ प्रास पय (७) सवमर्दून त्रास फट (<) शासोहण प्रास कख ८) साधा ग्रस्ते फल (१०) मध्यत्तम आस फल (१९) अन्ततम त्रास फल १८ चर्ण प्रकरण -., (९) धृष व्ण फल ,..

५०१

धष.

॥)

गोष.

६६७ १६२ २७० १७१ १७२

९७१ २७५४ १७५ १७६ २७७ १७८ १७९ १<०

१६१ १८ १८३ १<४ १८५ १८६

१<< ९८९. ९९० १९१

१५२

१५

प्रकरण. पिषय. (२) शृष्ण चणँ कल... (2) रक्तं षणे फट 3

८४) कवि वर्ण कख (५) वणं वरादसे ब्राह्मणादि को जश्युम कल... (६) चण वद्य विदोप फट „=

ग्रह शटि फल प्रकरण , भम (ट) भौम टि फट 2) बुधे श्ट कल -.. वि (२) श्रक्रः दि कल... = (8) शग्नि दष्ट रट... २१ («) शरः रषि कट "..

२० प्रह ्रस्त-फट =. (९) भौम भस्त फट (र) बुध अस्त फट... ०० (३) शर ग्रस्त फर... 5 ^ (४) शक्र प्रस्तं एल." $ (५) श्वल भ्रस्त फलद...

२८१ म्व फट प्रकरण ... ०० १०९ (“) दशा प्रकार फे मोक्त निय... ४४ (२) दक्षिण दनु मोक फक ,., (३) वाम दु मोक्ष फल “~ (७) दक्षिण क्षा मोक्ष कल (५) वाम छुक्षी मोक्ष फट „+

(६) दक्षिण पायु तथा याम प्रायु भोक्च फट. (७) संखद्न मोक्च कट <

(<) जरण मोक्ष फल $ (९) मध्य विद्रारण मोष्च चच्द ..

(>) भन्त्य विदारणाः मोक्ष फट (२१) मोक्ष समया वर्ण फल „+, 0

१९३ ष््थ १९६ २२७

२०४ २९५ २०६ >८७

२०८

२०९ ०१८ २१९ २९२

२९४ २१५ २१६ २१७ रेल २१९. २२९ २२१ रररे दष्टे रेरे

द्द्‌

प्रकरण. विषय. २२ कटः फट रकरण *.“ ००१ ००० (९) पक ब्रहण से भगे दोने वाठे अन्य ग्रहण का मासा खार फट ~. (२) छः माससेष्टोनेका फट . „^ (ॐ तेरह महीरनो से ्टेने का फल (७) अटारह मदीनोसंष्ोन फा रल (५) चन्द्रमा का ५।११ ओर सूय का १७ भिना से दने का फल ... , (£) चन्देमा फा वर्षं ओर सूयै का १२ वषै पीठे दोने का (७) प्क मासमेदो ग्रहणं दोनेका फट. 2 एक पक्षम दो रहण होने का फल. ८५) चन्द्रः रहण फे एक पक्ष*पीरे सयं यण

हाने का फर ... ०० (१०) सूये प्रहण के पक पक्त पीछे चन्द्र ग्रहण होने का फट ~. 4

५७ 7

9

(११) सूये, चन्द ओर फिर सूय श्रदणं होनेका फट »

(१२) अति वेला त्रहण फठ (१६) दीन चेखा ब्रहण फल ५& (९४) अति वद्य हीन वेखा ग्रहण नेमे दाका (९५) अति वेखा हीन वेटाकी रका का समाधान ३३ उत्पात फल रकरण (१) उत्पातो का प्रथक्‌र अद्युम फट २४ श्रहण समय याद वपो जादि क्षान प्रकरण... (९) नवां वहा से वर्षादि निणय-- (२) निमित्ता दारा धषौ आदि निर्णय २५ मनुष्या को जन्म कमोदि नश्च कल्रकरण.

(९) जन्म कमोदि नक्ष निर्णय, (२) जन्म कर्मादि नक्षत्र फल ... (2) जन्म नक्चन्न फट 4

६० ४२ ६९ ६३

1

६४

नैडाष्ठ. २२५

२२९. २३० मेद

रररे

मरे४ २३५ २२६

२२७

मर २३९ २४५ १४१ २०४२९ २७२ २४४ २४९ २५१ द्धर्‌

२५४ २५७

१९

श्रकरण. विषय. धृष्ट. छक. (४) जन्म रारि तथा जन्म खप्मफटे ... २५ (८५9) जन्म राधि मलः ~ „+ २५९ (६) जन्मादि दाद राशि फट ~ २५० २६ अनिष्ट रहण दान्ति धकरण .. > ६१ (९ साधारण शान्ति... ५८ ~ २६३ २७ ब्रहण रवण फट ,.. = ~ ६६ र्थ इति सम्पूर्णम्‌

9

४५ किष ॥. ५अ वि

नईं शोध नई शोध नई शोध आयुवेद मे बुद्धि व्दाने का उपाय

भाजकल विना विया फे मवुर्यों का जीवन दो ही मही स~ कता मौर विद्या के दिये बुद्धि फी तवता चाहिये ध्सीलिथे प~ रोपकारि महर्पिंयोनि युद्धि वदानि के अनेक उपाय यैक दस्मे वर्णेन करे उनकी अत्यन्त मावदयफता देखकर भायुर्वेद पा ननः व्यास पुनमचन्द्‌ तनसुख वेने घटत खोजके साथ उन उपार्या फो पक्र करके सरल दिन्दी भाषा दीका सदित निणेय सागर यन्पराटय छपवाकर थलिद्ध करी है जिसकी ध्रदंसा वैयक के

समाचार परनि मुक कटसेकी मूल्य र. पी से१।)र. = > हं मूल्य २.१) बीपी से १।); अद्धि वर्धक वटी

यष्ट वटी करं वपां के अनुभय से चना & शसक सेषनसे मस्तिक के श्षानतन्तु पुष्ट हो जाने से स्वभाविका ( देवा ) बुद्धि यदुत तीव हो जाति जिससे स्मरण शक्ति थद जानेसे फिर विदयाधि्ेः को परिक्षाम फरल होने का भय रहता इसके २१ दिनि सेवन करने योग्य पक डिष्वी का मूल्यर. १) बीपी सेस.

दस धिपयमे अधिक हाक जाननादहौ तो हम से पत्र व्य जहार फरे।

पण्डित मीगाख व्यास, च्यानर-राजपएूताना

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श्रीः ग्रहण फल दर्पण।

बरष्मेरविष्णश्च मर्हीि्तद्घान्‌ सम्दश्चनोऽगम्य निमित्तश्चाखरान्‌ श्रोमन्महारापघुनामपेया- नन्यान्समग्रँ श्च गरुनमामि च्या, विष्णु, महदेवनी आदि देवो को; मग, पराक्षर, नारदे आदि महर्पियो को; वराहमीर, नरपति, चण्डूनी भादि ्योतिष के आचार्यो को; ओर श्रोमात्‌ महारामदाप्तजी व्याप्तनी आरि प्रण गुस्ओं को मन्‌, वचन्‌, ओर कायि पणाम-नमस्कार करता हं कि जिनके अनुग्रह मे मेरा यह कार्यं निर्विघ्नता से मिद हो वहुफलं जपटदएनहुादिक्े स्मृतिपुराणविदः भवदन्तिदि सदुपकास्जिने चमत्कृतिः ्रहणमिन्द्रिनयोः; मवदेत्ततः २॥ परम पूञ्यनीय मदूर्पयोने जगत्‌ के दितायं मूर्यं तथा चन्द्रमाके थरः इण सम्बन्धी सम्पूणं प्रकारका ज्ञान तीन भागे मे बहुन विस्तार पे वर्णन किया है उनमे अ्रदण होने के समय, स्पशो, म्य, मोक्ष, स्थिनि, शर, स- म्पीटन, उन्मीटन, ओर के आदि के ञान का निर्णय ते श्िद्ान् आदि गणित के ग्रन्थो मे; रहण के ममय स्लान, दान, नप्‌, तेपृ हवन ओर्‌ सूतक आदि के कि निषेव का निर्णय पुराण आदि पतं शञाघोभ; भर महण के निमित्त पे सम्पूणं नगत्‌ भं हेनिवारे अनक प्रकारे चमत्कारी शुमाञुम कले का निर्णय सेहिता जादि फल विधायक ज्योनिष्‌ के ग्म्य कियाडे।

1

सारं सारं सगुद्धत्व पूं शा्ध कद्म्बतः कियते सुखयोधाय प्रदस्य एल्दूर्पणम्‌ ६२ अण पन सम्बन्ध रखने वाटे उपरोक्त तीनों विपयोः का सं साधा- रण को खंलपते बोघ-जानहो जनि के च्िर्भने अनेक भ्रकारके प्ाकरीन अर्यो मेते रका मी परम सरार रूप संमह एकत्र करे प्रिर अरटण जानने कौ गणित तथा ण्म शारो के विघान तो श्यहण निबन्ध नामक अन्यभ किया है ओर फषिन्‌ सम्बन्धी समपूरणंपरकारका विधान श्तण फर दर्पणः नामक ग्न्य मं करता हू! भाद्राजङ्लारविन्दतरणिरमाध्यन्दिर्नीयो द्विनो नानाशास्रविचार मग्रहदयो ग्याप्तावरङ्कार्कितः। वास्तव्यो मर्मण्डठे सुविदिते पाटीपुरे धापिको नात्यापोष्करणो महीषर घतः श्रीमिष्टलालामिषः ४॥ मारवाड देशस्य जोधपुर राज्यान्तरगत व्यापार के रि समपि शपाङी' नगर में निवाप्त करनेवाता, पुष्करणा जानीय, भारद्वान गेोत्री,मा- भ्यन्दिनीय शाखाध्यायी -शुख युवी, टङ्शालावरंक-व्यासपदापिकारी. श्रीमान्‌ महीवर शम्मा का पुत्र, ज्योतिः शात आदि अनेक भानीन शात के तैत्व का अन्तकरण से विचार करम मदा म्न रहनेवा्र ( भावीन उ्योगि.शासतर्रमी, देव भूपण, उ्योनिष्‌ रत्न आद) कनं पण्डिन मीग- छठ व्याम मन्यकेो मक्रारिन करता है | ग्रहण निर्णय चन्द्रस्य यदिवा भानोः राहुणा सह गमः उपरागमिति ख्याता तत्रानन्त फं स्थतम्‌ ॥५॥ हुवा चेतु के स्नाय चन्द्रमा का योग हन ते चन्द्र गहण ओर चा योम सेन तें अहण होता है उमे प, उपराग, ग्रह वा

महण कहने ६।

४,

महण होने का मुख्य कारण राहुः कुणामण्डरुगः शशाक शशाङ्क छाद्यतिन विभ्वम्‌। तेमोपयः शम्पुत्रर पदरनषतर सगौगयानाम विर्द्धमेदत्‌ चन्द्रमा का मम्ब पृथिग्रीकीछापरामँ ज्ञानि सै चन्द्र॒ ग्रहण जर्‌ सूयं के आडा ननि प्न सूर्यं रहण हेता दे यही यहण हनि का मुष्यर कारण हे परन्तु श्री महदेवजी के वरढान ते नन्द्र यहण के त~ मयते पुथिवी की छायाम ओर सू ग्रहण के पभय चन्द्रमा कै निम्ब अन्धकारमय राहु भते होना है इसी च्ि पुराण आदि धर्मशास्रो तथा णित फणति आदि ्योति ासत्रो मे अहण हने क] कारण राह माना टे} मरा धिरेष निर्णय मेरे बनाये हुये "वृददर्य मार्तण्ड" नामक गन्ध के ग्रहण निवस्य नामक अङ्गम क्रिया गया है! ग्रहण स्वामि प्रकरण पये स्वामि निर्णेय-- पण्मासोत्तरदृद्धयाः पर्वे; सप्देवताः कम्रः बरह्माश्शीद्र कोवेरावरुणाग्नयमाश्च िज्ञेया; सूचकः प्रारम्भ से | मीनो के क्रममे व्रह्मा आदि देवतां पर्व (ग्रहण) के खामि देते हे जेते (१ ) सेब्ह्मा, (२) से चनः) से दृन्र (४) मरे उतर, (९) सेवः (६) से अप्रिओीर (७) तैय। पयै स्वामि क्न-- शाकंरविगुभंमासैयतिरादयं पिभाजितं तानकरेपषटतेनान्वः रेषेपवेशा निर्णयः यिक्रम सवत्‌मे से १३९ हीन करने शेप हे शाव. ह्न का त्र कहते उप शको {रसे गुना कफे फ़ चै्राटिगणना मे अह के माप्त तक कौ संसवा मिाके ष्का भग नो

शेष रदे उप्तके का माग देने पे जो शेष रे उत्तका स्वामि. ब्रह्मादि क्रम्‌ मे ननि।

ब्रह्मा स्वामि कट

पर्वाधिपेव्रह्मगिसस्यसंपत्बुद्ि्दिजानंचतथा पशूनाम्‌ सेम॑मजानां घनषमंहद्धिनिसोगव।स्याद्विजयोमसार्जः म्ररणकाप्वामिच्ह्मादोतेो वर्या श्रेष्ट, चेनियो की सि, ब्रा हम्णो परओं को मुख, जगत्‌ में क्षेम कल्याण आरोग्य आद्रि शुमतया धनव धरम दी वृद्धि ओर देवनां जय हेवे। चन्द्र स्वामि फल--

्रेचपर्वाधिपतो मजानतिमेवविद्रजन पीडनेस्यात्‌ अवर्षणं धान्यमदर्प॑ताचविनाद मार्यातितयौपधीनाम्‌ २०

ग्रहण का सामि च्रहोतो्रनामे क्षेम कल्याण) दिहा बो

पीडा, वपी की कमी, धान्य तेन ओर्‌ सम्पण प्रकार की ओषधयो का नादा निमे क्रिराना नेन हवे |

ह्न स्वामि रट--

इन्द्रोयदापर्वपतिस्तदानीम्परस्परं स्यार्छुकयो ेपाणाम्‌ धान्यानिनवयन्तिशरद्ववानिश्षेमम्पजानां नमवेत्‌कदाचित्‌ ॥११॥ ग्रहण का खानि इनदर हो तो राना के परस्पर वेर शरद्‌ चतुर

उत्पन्न हनि वा धान्यो का नाश्च ओर जगन्‌ में अक्षेम तथा अकल्याण आदि अशुभ फल हवे |

कुवेर स्वामि फल- यद्‌ाङुवेसोग्रहणापिषः स्पात्तदाथनाक्षोधनिना जनानाम्‌] सेमं घुभिक्षंचनिरामयत््वं रोकाशसर्वेभयवर्जितास्युः १२

महण का स्वामि कुनेर हो तो धनवानों के भन का नाक, जगन मेँ केम कल्याण, आरेग्य, निर्मयता जीर सुमित हेत

दरण स्वापि फकट- लले्वरोपर्वपतौ सुमिक्॑मनास्तथोपदरबवजिताश्च तेमंचसर्वैतरथनमदद्धिः पीडांधमा्यांति राजयुतराः १३

ग्रहण षा स्वामि वर्ण ले तो नगत्‌ मेँ केम कल्याण, धनकी वृहि, ६1 पूतन

पदर का नारा, ओर सुभिश्च हनि जिप्न मे भरना को आनन्द किन्तु रान तर को षीडहते।

असनि स्वामि फल

प्वाधिपोग्निः सतुमित्रनामाधनमदद्धितभयं कितौचः

शुमाचदष्तरपतीनूष्देतस्छान्‌ निरोगतां चापिकरोतितस्यम्‌॥ १४॥ अहण का स्वामि अपनिहतो तरपो श्रेट कयो की वृष्टे, थनकी

भप्ति, भय तथा रोगो का नाश ओर राजाओं का कार्यं सिद्ध हेष यम स्वामि फट

यमोयदापर्वपततिस्तदास्याद्‌ दर्षणंभूपभयंमनानाम्‌ अकक्षय॑चौरमयं पृयिव्यदुभिक्तमेवं युनिभिः मदि्ठम्‌ १५ अहण का स्रामि यम हो तो नगत मे अनावृष्टि, उरभ्ष, धन्य का माद, चोरं फा उपद्रव ओर राना का भय हेवे। स्धामि रहित पचै कट-- पर्द्यदीरनग्ररणं यदास्यात्तदापरजानाम शभमर्दहि अदणिदंसुन्मरकमदं कदापिकालातरतोभवेत्तव्‌ १६ को$ काल मे कदाचित्‌ स्वामि के विना ही ग्रहण होवे अर्थात्‌६।६ महिनो का कम ोडकर ५1५७।११।१३ आदि मरहिनोमे वाहि भिप्ठ समेय ग्रहण हये जावे तो नमत्‌ मे अनावृष्टि, दुभि जौर महामारी आदि अशुभ फल हेवि

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अयन फर प्रकरण उत्तसयन फट द्विजाना क्षभियाणांचगवांच पीडनेभकेत्‌ धान्यं मदर्पपणमासेः ग्ररणेचोचरायणे १७ अहण उत्तरायनमंदहयतो माम तह वाद्मण. क्षत्री तथा म्यौ को पीडा ओर धान्य हणा लेदर! दक्षिणायन फट-- दक्षिणायनगेराहौ वैदयददर भमर्दनम 1 महिपेकुनरेपीडातरिमिरमतिरमर्षताः 1 १८ ग्रहण दक्षिणायन में हो तो माप्त नक तरैराशू्र तथा मियो जर हधियो को पीडा नथार्गेहो हो जवं --€ॐॐ -

मासि फक प्रकरण कासिक मास फकट--

कांचक्यामनटोपनीविम्गधान्‌ भरान्याधिपान्‌ कोश्षखान्‌ कंस्मापानयग्रूरमेनदितान्‌ कादाीश्च संतापयेत्‌ इन्याचाश्कलिगदेशतूपातिं सामात्यभृत्यं तमो दृष्टं क्षत्रियतापदं जनयति सेमं घुिक्षान्वितम्‌ १९ रहण कार्तिक मं होतो सुनार, दुहार, इत्यवाई, माइभूने, वा न- तरेर आदि अमि से जीवीका कले बटे; मगध देश, पू देश, कौशल देश, कल्मप देर खएसेन देश, कारि देश, कठिग देश फे राना तया भना को षीडा; ओर धान्यादि का माव सला हो नवि भूगदिष्ट मास फल-- 'कादमीरकान्‌ कोशलामपौ दान्‌ मृगाश्च हन्याद्परातकाश्च ये सोमपास्ताश निति प्ौम्पे सुदषटिशसेमषुभिक्षृच ॥२०॥

रहण मिगशिरमें लेते काडमीर कोश दर अपरन्तक-न दर्ग मे कष्ट, पुज का नाष, सोमपान कर्ने वासो को पीडा ओर्‌ न- मत्‌ मँ सुपृषटि सुभि तया क्षेम कल्याण रहैवि पोप मासन फट पोषे द्विनक्षत्रननोपगेषः ससैन्धवास्याः ङुक्ुराविदेहाः ध्वंसं चजेतयत्र पदर भवं वियादगुभिक्षयुक्तम्‌ ॥२१॥ ग्रहण पोपर्म हो तो व्राह्मण तया क्तरयो को पीड़ा, पिन्य कुकुर विदेह-इन दे्ञो मे क, ओर जगत्‌ मे वपी।कौ कमी तया दुर्भ जदि के¡ मय हवि "। माघ मास फल माधे तु माठपितृभक्त बदिष्टगोत्रान्‌ स्वाध्यायधरमेनिरतान्‌ करिणस्तुरगान्‌ वंगांगकाद्विभनुजांश्च दुनोति राहू- ष्ट शषुकजनासुमतां करोषि २२ हण मावरर्ेहो तो मताषिता की भक्ति करने वाटे, वततिष्ठगोत्री, नेद पाठी विद्यार्थ तथा पर्मात्माओं को कछ हाथी तथा बड़ काना; येग, अंग, कङ्क, इन देशो मे छश्च ओर जगत में वर्पा सेति करनेवार्गे कै मन चाही हेवि। फल्गुन मास फट पीडाकरं फारयुनमात्तिपवं येगास्मकावतकमेकलानाम्‌ सृसन्ञ यस्य भवरांगनानां धनुष्कर क्त्रतपख्िनां ॥२३॥ ग्रहण फाल्युनर्मे हो तो नाचने तथा मनि वारो, श्रे्ठ लियो भतुष जनान वर्यो, सत्रियो तथा तपस्या कले वा को पीडा; ओर वंग,अम्मक, आघ्नत, पफल स्न दशो मे छश देषि।

चैत्र मासं फल-- चैभ्यं तु चित्रकररेखकगेयशक्ताम्‌ रपोपनीवि निगमल्ञदिरण्यषण्यान्‌ पौदरान्धक्ेकयजनानथकादमकांध- तापस्पकत्यमरपोत्रयिवि्वपीं २४ ग्रहण चैत्रमेहो तो चिन्नकार्‌ तथा फोटाग्मार, टेक) घर ननानि वर वेश्य! मांड तथा नारककार्‌ आद्रि सूय सि जीकिका कटने वाख को पीडा; पीटर, भान्ध्रक, कैकेय तथा अस्मक-दइन देवो में छेदा ओर सरना तथा व्यापार की अन्य वस्तुओं .का भाष तेन हो जवि वैशाख मास फट- वैदाखमाते ग्रहणे विनाहमायांति कर्पासतिटासपुदराः ईष्वाकुयौपेयशकाः काटैगाः सोपद्रवाः कितु घुभिक्षमस्मिन्‌॥२५॥ ग्रहण वैशाख भे हो ते इष्वाङु, योषय, शक, कर्टिग-इन देशो भे उग्र; क्स सई सूत कपडा, पिठ तट, तया सग का भाव तेन ओर जगत्‌ मँ सुभिक्ष हेवि। उ्यष्ठ मास फल-- ज्यैष्ठे नदः द्विजराजपतन्याः सस्यानिदृष्टिश्च महागणश्च मध्वंशमार्याति नराश्च प्नोम्याः राः समेताश्च निपाद्षधाः२६॥ ग्रहण ज्ये में हो तो बराह्मण राना तथा रान सी, मटगण) निपाद तथा सोमपान करने वादों को पीडाः; ओर यणा की कमी, तथा सेतियोका नश्च निमे धान्यतेनलो ने आषाढ मास कट आपाद्परवर्पुदपानवम नदीमवादान्‌ फटमूलवार्चान्‌ गापारकारमीरपुष्द्चीनान्‌ इतान्वदेव महद्पैमरिमन्‌ ॥२७॥ पण्‌ जपाद भे नदि आदि, कर, भूल, कन्धार, का- इमीरे पदः चीन आवि का नाश ओर पं सथर एकमी नह हेवे।

भ्रादणं भास द्- कारपीरन्‌ सपुदिद्चीनययनान्‌ हन्यान्‌ कुरपेत्रजान्‌ गाँधारानपिमध्यदेशसहितान्‌ दष्टो प्रदश्रावणे। कांवोजेकदाफाश्वशारदमपि त्यश्त्वा यथोक्तानिम- नन्यत्र प्रचुरानृष्टभनुतरद्धानीं करोत्याटताम्‌ २८ 7 ग्रट्ण श्रावणे हो तो कादमीर, पुरि) चीन) यवन देश, कुरु देश, फन्धार, मध्य देश, कानिज, एकपाद्‌ देश-इनका तया शरदं प्रतु उतन्न हनि वे धान्यो का नाश्च किन्तु उपरोक्त देशो को कै अन्य देशों घान्य की वृद्धि तथा मनुष्यो फो आनन्द्‌ हवे भाद्रपद मास फल- ऊुदिगवगान्‌ मगधान्‌ घुराष्टत्म्ेकान्‌ वीरान्‌ द्रदादमकांश्च क्वीणां चगभानगुरा निदंति छुभिक्षकृद्धादरपदेभ्युपेतः २९ ग्रदण भाद्रपदरमे हो तो ा्टिग, वेग, मगध, सुराष्ट, म्ले देवा, सुवीर, दर्द, अश्मक, इन देशों को पीडा स्यो के ग्म नाश ओर जगत्‌ मँ सुवृष्ट तथा सुभिक्ष हेवे। आश्विन मास कट-- कावोजचीनयषनान्‌ सददिहिपरृद्धि वा हीकतिधुतरसापिजनां हन्यात्‌ | आनर्चपोदरभिपनजश्च तथा किरातान्‌ दणष्टोषठुरो्वयुनि भूरि छभिक्तकृच ३० अहण आपरोन मेँ हो तो कांबोन, चीन, यवन, बराल्हीक; पिन्ध, अ- नात, पोर किरात-इन देशों मेँ कष्ट, शिल्पी (कटर आदि) तया वैदो फो पीडा ओर जगत भे बहुन श्ट सुभिस् होवे मास विद्धेषप का फट-- ` अन्वय॒जमायका्तिकमाद्रपदेप्वागवः घभिक्तकरः राहुरषशेषमसिष्वशुमकरो वृष्टिथान्यानाम्‌ ३१ २.

१०

ग्रहण यदि भाद्रपद्‌, अततोन, कार्सिक वा माव हो तो सुभिक्ष तथा धान्य मन्दा ओर जो मिगरिर, पोप, फाल्गुन, नैव, वैशाख, व्ये आपा वा श्रव्रणमें होतो वपा तथा धान्य का नारा हेव

सूय प्रहण का विसेष मार रल-- मू ग्रहण ऊार्षिकमे होते सुभिक्ष, मिगरिरर्पेरोतो रप क्प तेन, पोपमे शे मो धान्य तेन, मावमें हये तो मप्यम फट, पल्गुन हो तो धान्य बहुत तेन, चैत्रमें हो तो धान्य संग्रह करने ते शीघ्र राम, वैशाख मं तो धान्य संग्रह कर, ज्येष्ठ मे हो तो घान्य अवदय समह करै, आपाद मे हो तो दुर्भ राज्यविग्रह, श्र्रणमं हो तो पान्य नेचेनेमे खम, माद्रवामे हो तो युभिक्त ओर आसोनमे रे तो घृत तेरतेम होवे ।३२॥ खन्द रहण का चिरोप मास कल-- चन्द्र हण कार्तिक में होतो सुद्र मे विरह, मिगशिरमेंहोतो धान्य संग्रह करन से महिनो से लाम, पोपमेहोतोरस्र तेन, मावमहोतो संग्रह करने पे सघ टाम, फाल्गुनमें होतो अगे रस्ततेन, चैत्रमे होतो वर्पो काठमे दुर्भि, वेशवर्मे होतो मव व्छतु तेन, ग्येठमें हो नो सुमित इप्तचियि धान्य शंप वेन दै, आपाद हो तो रमक्प्व्सुतेन) श्र्ण्मेहोोस्वव्सुकानादा, भाद्रपदरमे हो तो धान्य भेचकर्‌ रर प्रह करं ओर आप्तोनभं हो तो कषाम रट भूत आदि तेन होवे } ३६ अधिक मास फट- कदाचिद्धिके माते ग्रहणं चद्रमूयोयोः 1 सर्वगष्टरभयं भंगः क्षये यान्ति मही भुजः ३४॥ ग्रहण अधिक मपसर्मेहोतोमर्रषका भैम त्था भप ओर्‌ नाभं को डया हेवि !

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९१

वार्‌ फट प्रकरण

र्बिवार कड-

अस्प घान्यारप मेघाश्च स्पररपक्तीरा श्च धनेवः 1

क्िगदेश पीडा ग्रहणे रविवासरे ३५

भरहण रविवार को हो तो वपी फी कमी) धान्यकी उत्पत्ति भप) सवत्‌ साधारण, माये के दूष यडा, रानां मे युद्धः किन दे मेंपीड्म ओर धरत तैल के वेच देने से ठाम हवे चन्द्रवार फट

कपूर मदिरश्चेष्र विनयन्ति वरांगना;

यथुनातट पीडा दुरभक्तं तस्कराद्धयम्‌ ३६

ग्रहण चन्द्रवार कोहो तो कपूर्‌ तथा मद्य का नाश, परिधी श्रेष्ट री यो क्ट युना के किनि के वेशे मे पीड़ा ओर धान्य तथा तेलके समह्‌ केने से डाभ हेवि। मंगखधार फट--

राजङ्कुनरपीडाच दुरिक्षं तस्कराद्धयम्‌

अवन्ति देशपीडाच मद्रेग्रहणं यदि ३७

अह्ण मंगलवार को हो तो राञ्यहायी को कए दुर्भिक्षका मय, चो का तया अग्रिका उपद्रव ओर अवन्ति (मारवा ) देशम पीडा होव। बुघवार फट --

पीत धातु मदर्थं सरार चान्यं विनद्यति 1

कोले छजभंग श्च ग्रहणे युधनासरे ३८

दण बुधवार कोद ती चाव आदि सार धन्यो का नाश सोना पीतक आदि धातू तेन, कोश देश में किती रानाको पीडा ओर सुपारी तथा छार षस संय करने से छाम होे।

१२

गुरवार फर स॒त्य कौवरेतायेच विक्रवस्तु भकारकाः पीडयेतिसन्धु देदोच ग्रहणं गुरुवासरे ३९ ग्रहण गुस्ारको हि तो स्तय बोखे वा, प्रषितर रहने वे, वित्र विचित्र वतु वनानि वरि तथा मिध देश के रहने बट पीडा मेगे ओर पटी, सुगन्धी वस्तु तथा नेट आहि सयह स्सेमे राभ हे दुक्रवार फर -- रा्नामन्तः पुरं वैव भृगुकच्छ विनाशयेत्‌ रजतमौक्तिफं वस ग्रहण भृषवासरे २० श्ण शुक्रयार को हो तो राज्यके मर्यो मे उप्र, भर्ञोच देशमे पीडा दिन्तु अन्य देशो मेँ सुल, चादी मोती तथा सेत कपडेवा माव तेन ओर जगत्‌ मे मगटीक उत्व अधिक देवे। इानिवार फट सिन्धुतीरे सौरा म्यं तस्काराद्धयम्‌ राजन्ति पिनाक एषणे मन्दवारे ४१ अदण शनिवार कौ होते रिथ तथा सोरठ देश मे धान्य तेन, चोरे का उपद्रव, रानके मन्त्ियो क्ष्ट जवार तथा अफीम आदि काटी वुरतु तेन ओर धेडे राते वह तथा ताना आदि सरयह करनेसे माप भे लाम होवे। सूये ग्रहण बिदोप वार फल-- सुर्यं अण रवार दो हो तो गेह नाध युग आदि धान्य तथां गुड कासग्रहकरे सेदो माप्त मे बहुत लम होवे !४२॥ सोमवार दो हो तो यृ तिल तख युग उदड्द्‌ तया जकीम आदि काटी क्तु का प्ग्रह क्रने मे लाम हलेवे {४३१

मगल्ार को हो तो कपप रुई सूत कडा चादी मोती हुमाशर न~

शद

लर मनीठ र्हगदु धृत खंड गुड़ सबा भंगा गेहं जावर आदि पर्व षु का सेह करन ते सदि चार माप्त से बहुत लम्‌ हवे ।४४॥ ञुथवार फो हो तो जार बानी मोद चने आदि धान्य सुपारी कपाप्त कपट छवेग अफोम आदि सग्रह करेति दो माप्न पीठे काम हवे}४९॥ गुस्वार फो हो तो तिर तेल एरंड अ्दी सरमों खारक कलि वत्र भग्रह करने से चार माप पीछे टाम होवे 1८६।॥ ह्वार को दातो वायु का जोर वपा अधिक्र धान्य भाव प्राधा रण ओर्‌ वतिय की वृद्धि होवे।४७॥, शमिवार फो हो तो तिरु तेल तमाषु काटी वस्तु तया श्स्र का पग्र करन से बहुत लाम होवे।४८॥ चन्द्रः प्रण विद्रोप वार फल चन्द्र हण रविवार कोहो तो अफीम ओर चंद मन्दी होवे इततस्यि परिेही वेचर्द ।४९॥ मोमवारको दो तोर पहिटेसे संग्रहक्रने सेर मात्र्मेष्क सशी पर स. २९) ३०) का ङम होवे।९०॥ मेगल्वार फो हो तो रपा तथा जप्द राई के मेथी आदि के प्रह करने माम्र पीछे ठम होवे ।५१॥ नुषयारकोहोतोकषंभा मीढ तथा सेनि के संयह्‌ से ठाम होवे 1५२ यु्वार को हो तो रुं के संयह करे से मास मेँ एक खंडीपर रु. २०) २५) का छाम होवे1९२॥ सुकरता को हो पो, नगत्‌ मेँ आनन्द्‌ आर रुद मन्दी हो नविगी उप्त मय सरीदेने से आगे मि पीठे अच्छा खाम होवे ।९४॥ शनिवार कौ हो तो अल्दी सरसों एरंदी तिठ आदि का पग्रह क- श्नेमे माप्त उम हवे ,९९४

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१९

नक्षत्र फट प्रकरण भग्विनी नक्षत्र फल-- अश्वाश्च सेनापितैय सेवकास्तु रेगदक्षा वणिजश्च वारकाः स्पान्विताश्राशवहराः फलानि परयान्तिपीडां ग्रहणे यदाग्विने॥५६॥ ग्रहण अश्विनी मे हो नो घोडे, सेनापति, वैय, नकर, पेज का पहिचानन षटि, व्यापारी, रखवा, स्वरूपवान्‌ घोडे को हतेने वटि, ओर नानि आदी फट-इनको पीड़ा हवि 1 भरणी नक्षघ्र फठ-- येदन्ध ताठनवया निरता महुष्याः कूरास्तथा रधर मांसमूजो पियेस्युः येचापि नीचङुलस्नायपि सखदीना स्तान्‌ पीटयेत्तुपकणान्‌ ग्रहणं भरण्पाः ५७ ग्रहण भरणी मेदो तो वथ बन्धन तथा ताडन करने वटे, माप्त भस्ी, मीच कूोत्त सन्ते रीन ओर चने आदि तुप वलि घान्य-ईनको पीडा देवि। छृत्तिफा नक्चत्र कट-- भेस्ू्रभाप्प ऊुदाला अपिमन्त दक्षा आकारिका द्विन पुरोहित इुम्भराराः। येचाप्निहन्न निपुणा अपि मेष दक्ता- स्तान्‌ पीरयेदप्रहणकं पदिङिकापाम्‌\) ५८ 1 महण रुततिका में हो तो सुतर जाने वे, माप्य कर्ने वाहि, मन्त्र श्त, सो के द्रोभे, चाह्यण,राज्यपुरोहि, दमार्‌, जगनिहेत्री ओरवृटि ` विद्या जानने वाइन पीडा हेवे। सोशिणी नक्षत्र फल-- बाणिजञ्यमप धनिमु वरतकर्पुकाश्च तोयान्त शाकिकमौ हप शलमान्वाः

१५ भोगान्विताओ घुतखंड वराङ्कनाश्च

पीडां परयान्ति यदिसेदिणिभे प्रह्यार्‌ ५५९॥ ग्रहण रोहिणी पे हो तो व्यापारी, राना, धनवान्‌, प्रेष्ठ तरत धारण गकर वले, खेती करने वारे, अर धान्य, गादीवान्‌, गाय तथा बैड, पकति- वासी, नाना प्क्ाएफे भोग मोगने वालि, प्रन, स्राढ़ ओर वेश्या-इन को पीडा होवे। भृगशिर नक्षत्र फट- वञ्राञ्व पुप्प फृड रत्नविदं गमाश्च गान्धवं कायुकसुगन्थि वनेचराश्च , येसोमपाशवहरिणा अपिेखदारा- स्तान्पीडयेचनटकान्‌ गरहणं मगर ६० रहण मृगि मँ हे नो व, कमठ, फट, पु, मोती ज्व रल, पी, गनि बि, कामी, सुगन्धी यस्तु, वन मेँ त्रिचरने वटे, पोमपान करने वषि, हरण ओर ठेवफ-इनको पीड़ा हषे आद्र नक्ष फट~ चौर्य शषादयववम्धन्‌ मेदकास मन्बाभिचार छुशछा परदार क्ताः वैताष्टिका वृपताः कडफौपधानि हन्यादुपरहोर्कशािनो यदि रौदभेप्यात ।॥ ६१ भरहण आद्र मँ हो ती चोर, सट, बन्धव भेद कसे षरि, मन््रप्रमो- गते शत्रुओं को दण्ड देने वे पराई न्वयो से रनेह रखे वाहे, वैताल को वञ्च भें रखने घरि, मचिने वारे ओर कडशे ओपधी--इनफो पी हे | पुनय नक्षत्र फर-- ये प्त्यश्रौच निरताःकुाख पञोन्विता स्पाम्विताश्च धन धान्यं युताशशिह्पिनः

१६

सेबायुताश्च बणिजः शमधान्यमन्निणः पीडाम्भायन्त्यपि ग्रहणं पुरनर्बभौ ६२ अरहण पूर्षु भे हो तो पत्वादी, पवीत्र रहने वाटे, चतुग, यर ¶- भेवाटे स्द्पवाम्‌, घन पान्यते युक, कारगर, नोकरी करने वलि, व्या“ शै, चाद आदि धान्य.ओर्‌ राज्य मन्वरि-दनको पीड़ा सेे। पुष्य नक्षत्र फकट-- पुष्येतुदाटीभषु घनानि मन्त्रिणो भूपाश्च गोधूम याश्च साघदः॥ यहेष्टिसक्ताः सलिलोपजीविनः पीडां पयांति प्रह्ेर्क सोमयोः ॥६३॥ ग्रहण पुष्यमहा ता चाव्ट, गुड खंड, स्री, रा्य मन्त्रि, शना, गेहं, नव, साधु, यज्ञ करने वे, ओर जरसे जीविका करे वचि-इनक्ो पीडा रेवि। सच्छेषां नक्षत्र फल~ शिरपानि पन्नग विषाणिच कंदमृख कयोः परस्वहरणाभिरताश्च वेधाः 1 चान्यानियैव सतुपाहनि नाग वर्यो नाशं भयान्ति यदि पर्वं भुजंगमे स्यात्‌ ६४ अहण अशेपामें होते कारीगर, सपं कारि अम, रप आदि के कषोण, चन्द मूड, कीर-रे्म, चेर, वैय, तुप पा सयं धान्य ओर नागरे के पान-ईनको पीड़ा हेवे। मघा नक्षत्र फल ्ठ्षगं यद्वि भवेद्‌ ग्रहणे तदानीम्‌ नारीद्धिषश्च पितभक्ति त्ताश्च शूराः दोलाश्रयाः फल्युजो बणिजश्वकोषटाः पी्भियान्व धनान्य युना रप्ाश्च ६५ !।

१७

अरहण मघार्म होतो चयो पे द्वेष रखने वाहे, पितैश्वरो के भक्त, शूरवीर, पर्वन प्र रहने वाल, फल भेण करने वे, व्यापारी ओर कोठा गाए-इ्नको पीडा देवि 1 पृषो फाद्य॒न नक्षत्र फएल- गवांविषालि शिदिपिपण्य कुमारिकाश्च कार्पासतैल छवणान्पति घन्दरांशच दुर्गीश्रयाश्च फठमाक्षिकयोपिताश्च भार्फाल्युनीजनित प्रंणियांन्ति पीडाम्‌ ॥६६॥ अहण पुर काल्पुमीमे होतो गर्ववहि, शिखी, खदने पेचनेकी पतु, कुमा कन्या, कपापत रूट मून कपडा, प्व मकारका ते, कारका लवण, खद्पवान्‌, किलं रदनेवलि, नार आदि समपूर्णं फल, सहत ओर सियो-इनके पीड़ा देवि उत्तरा कारगुनी नक्षत्र फठम्‌- ये शौर्यं मारह्वयुता विनयान्विताश्च पाखंदिदानश्भकरमं रतानराश्च शाख्मवीण श॒मधान्प महा नादया स्तान्‌ षीडयेद्रहगमुत्तर फाद्गुनीपु ६७ ग्रहण उत फ्युनीमे होतो पराक्रमी, देया, विनयकात्‌ प्रती, दानक शुम कर्मं करनेवदि, शारी, चाव आदि, धन्य ओर श्रीमन्त धनाव्य-इनको पीडा हेव दस्त न्त्र कर-- तेजो युताश्च वणिनो रथिक्ैनराश्च पण्वानिशिरिप तुष धान्यगजुधिरोह्यः चौराश्च कास्रङशलाः परिषीिताःस्यु- ईसतेयदा्रहण मिन्द्रिनयोस्तदानीं ६८

१८.

अहम हमे होतो तेजस्वी, व्यापा, रयीयोया, हाय, व्यापी वतु, कारगर, चावल चने आदि तुद धान्य, हायीपर चदनेषरे, ओर पण्डित-इनको धीडा देवे ! चित्रा नक्षत्र कट- ¢ श्षालाक्य चिज्रमणि भूषण राग्ेख्यः गंधादियक्तिकशदा अपितन्तुरायाः तानूपीढयेद्रणितकोतरिद्रजधान्यां चित्राररूयमेयदि भवेद्रहणरवीन्दोः ६९ यहेण चित्राम होतो शख विकत्ावाे वैद्य वा परनन-डाकदरः चित्रकार फोयोग्ाफर, नेहो, रंगरेन, केक, अतर नानेव, केषा वुननेवादे, गणितज्ञ ओर उत्तम षान्य-द्नको षीडा देवे स्वाति नक्षत्र फट-- धान्यानि बात बहुलानि खगा मृगा येतापप्ताश्वलघुसत्व तुरंगमाश्च सेचापि पण्य्घुशरा चरु सोष्टदाश्च स्ातौग्रहे वगः परिपीहितास्युः ७०} ग्रहण सवनिमें रेते। मटर चने आदि वायुक्ारकं धान्य, भवादि पशु, मयुरादिपक्षि, तपस्त, सलक्षन, घो, व्याप॑स कुश, चर नित्त-

वि ओर्‌ व्यापारियों को पीडा हेवि। विशाखा मक्ष फल--

आस्त पुष्य गाखि नखानियुदाः

कपा्तमापर चणकाः सुरयाग्निसक्ताः 1 नाशंम्यांसपिपुरेदर्वह्ठिपिष्ण्ये

चे्रार्कयोरयदिममद्रदण समर्वः 3? अरण विशा मे होतो रंगे पुप्प, छल रंगकते फल, लान

^

१९

- शालावलि वृक्ष, जख, मग, रु, उद्द, चने, देवता ओर अग्मि -काम्‌ सेनेव नको हेमि किन्तु धान्यदि दां मन्दे है नवि भनुसाधा नक्षत्र फर-- शौर्यान्विताश्च गणनायक सापुगोध्रौ यानग्रसक्त हृदया अपिसाधवश्च म्यं शरद्धवमपि भदाे भयान्ति भे्ाख्य जो ग्रहण मिन्दिनयो्यदास्यात्‌ ।॥ ७२ ग्रहण अनुराघामे रेनो पराक्रमी, वहुनते ममुप्योके स्वानि, पापु अकी सर्म करनेवाले, वारनपर चदन के हीषीन, प्ाधु महात्मा, ओर प्रद्‌ छतु उत्पन्न हेनिवनि चावल मक़ी ज्वर्‌ मग तिर आदि धन्य- इनको पीड़ा हेषि ज्येष्ठा नक्षत्र फल-- अयन्त भौरवकुरनित् यक्षोन्विताश्च सेनाधिपानूपतयो बिलिगीपोये ताभ्रादिक्रं परथनापटताश्चयेते पीडाभयान्ति यदि पर्व घरधिपर्षे ७२ ग्रहण ज्ये होतो अथिक पराक्रमी, कुलीन, धनवान्‌) यश- सी, भेनापतिः राना, शवुओंको जीतनेकी इच्छे, ताबा आदि -धाठु आर्‌ नौर-दनफो पीड देवि मुरख नक्षत्र फरट- . बीजानि चापि धनयुक्त गणाधिपाश्च युष्पौपधानि भिषजः फरमूलवाता येचापि भूर फठव्िजनाश्वतेषां पीडाकरं रविशषकि ग्रहणं भूखे ७४ महण मूटरभे दो षो सर्व प्रकार के सीन, अति घनवान्‌, बहुत पे

२०

मुय मँ मुख्य, पुप्प, ओषधी, कय, सर्फ, कन्दमूल, ओर इन वसतु- अंति अनीता करनवलि-इनको क्षेडा हेवि पूवांवाद नक्षत्र फट-- ˆ ये ससदौच निरवा एद पनाय पानीय मागगमना नल जीदकाथ तोयाद्धवानि कुद्ुमानि फलानि चैव महयन्ति पर्णि सेतुकरानरर्े ७९ महण पूर्वापादा मे होतो सल्वादी, दशचयुक्त, मुरीट, धनाय मुद्र आदि नल हिवन करने उतन्न नेवारे फट पुप्प ओर पुट बनानेवाटे-रनको पीडा हेवे | उत्तराषाढा नक्षत्र फट- तेनसिन स्तुरगङनर महयोधा ये स्थावरानगतियन्बिक देभक्ताः। भोगान्विताश्च मुजाः परिपीडिताःस्युः मेमंमिं पि्वे्गतोग्रश्ेव ७३ रहण उततरापाद भे हय तो तेनस््ी, घोडे, हायी, मषछट-फुती कर- नेवल, योधा-दूरीर, स्यावर-वकषारि, यन्त्र वनानिवाछे, देकनाभेकि भक्त, नाना भकारके भोग भोगनेवारे-ईनकेो पीड़ा किन्तु जगते सिम कल्याण तथा शुभि हेवे श्रदण न्नर षफ्ट- मायाविनिसोधम ससषमाँ उतपरािनो माग पतोक्त धर्माः यान्य द्विनाकर्मुयेसमर्या स्तान्‌पीदये चेद णश्ुतौस्यात्‌ ॥७७॥ अह्ण श्रवणमे हो तो माया केनेवारे, निल उद्यम करनेवारे,

पय धर्म, उत्साही, मागवन प्रदी, गोधूमादि घान्य ओर वेदिक क्म कर- नेवाखे बाह्मण-इनको पीडा हेरे

रेष धनिष्ठा नक्षत्र फकठ- वाश्च मानसंहिताश्चर सौहदाश्चये स्द्रोचेणः श्रमपगा बहूवित्तयुक्ताः ये चापिदान निरताः परिपीडिताशस्युः श्वौराग्निमिश्च वश ग्रहणं यदिस्यान्‌ ७८ ग्रहण धनि से नो नुम, मानरदिन; चट चित्ति, सियो ते देष रना, शमपरायण, बहुत विच्वलि ओर दामी इनफो पीड़ा तथा चोरों का अनिका उपद्र हेषे। द्रातमिषा नक्षत्र फक येपत्स्य पेयनिर्ता खपिपाश दस्ता जीवाश्च जठचरा जलजाहयाश्च ) येशोटिका रजकमौकरि शाकुनाश्च नाशभयनित यरणरक्षमतो ग्रह्ेत्‌ ७९ ग्रहण श्ानभिपामि हो तो मर पकड्नेवटे, पराश डल्नेवठे, जर- चर्‌ जन्तु, कम, बरोडि, कटा आदि मद्य सनानेवदे, धोनी, सोरकेरीक जर पक्षीवातरी-इनक पीड़ा देति पूरौ माद्रपद्‌ा नक्षत्र फट कीना प्पालक तस्कसश्च धर्मवतेधिर्ताः कडनीचचेषठाः ये चापि युद्धङ्शा मनुजा चिना पूर्वाष्ठ पर्वयदि भदरपदाघुयान्ति ८० अहण पूर्वा माद्रपदं हो तो कीनाश, प्ता करनेन, परु पाक्ने- , वा, चोर अथि, बरहि, सठ, नीच प्रछत्तिवाठे जर युद्ध करने इुशक-दनको पीड़ा हेवे

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ॐच्तरा भाद्रपदा नश्च कट- पिपामहाम विभव दानस्तास्तपोन्विताः पातरंहिनः ऋरतुरताभ्रमिणो नरे्वराः 1 तात्‌ शारघास्य महितान्‌ विनिहन्ति परव चन्द्रार्कयो मवति अद्रपदोत्तराषु ८१ महण उत्तरा ाद्रपदामे तो याह्मण, अविक नैभववानि, महा- दानी तपष्वी, पांडी, यत्त करनकारे, आश्रमी, राना, ओर शार ॒भान्य ^ ष्ठ पुरुष-इनको पीडा दो3े रेषती नष्छठत्र फल- तोयोद्धवानि कुस॒मानि फलानि गन्धाः शखाबु नानिखणं सुगन्ि पुष्पम्‌ नोकर्णधार बणिजो मणिमो्तिकानि नयन्ति पौप्णभगते ग्रहणं खीन्दोः ८२ ग्रहण से्ीमे तो जनमे उतपन्न हेनिषाे फन पुण, सुगन्धी द्रव्य) शख, कमल, खण, सुगन्धी पुप्प, नवीन करणधार्‌, व्यापारौ ओर मणि तथा मोती-इनको पीडा देवि नश्चघ्र षदा से घान्यादि की तेजी मन्दी- अश्विन्यां पीडिनायां स्यात्‌ मुदरादीनां महरषता भरण्यां श्वेत वसेभ्यो लाभं मासत्रये भवेत्‌ ८३ कृतिकायां देमरूपा वारम मौक्तिकम्‌ सग्रह लामदायी मासे नको स्पृतम्‌ ८४1 सोषण्यां सूतक संग्रहो उमदायकः ! दश मासान्तरे भोक्तः सोम्ेधा चेदिह ८९ पग्र मंजिष्ठ लाक्ता सारः उुशुम्भकम्‌ 1 पै दापने ला टके वपते त, चु भै पृते मदर्यमादरंयां लाभं मापतपज्यक्े |

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तेलाछाभः पुवः मास .पज्चक्रतः परम्‌ ८७1.

युष्पेमाते सिभिर्खमो भवेद्रोषूम ग्रहः 1.

आद्छषायां तु सुदेभ्यः भातिः स्ान्मासप्न्यक्े ८९

गहण अशि गक्षत्र्मेहो तो मुंग भादि तेन, मररणीर्मे ष्टो श्वेत कपडा संग्रहं करने भे "महिनो से टाम, रत्तिकामें होतो सोना चांदी प्रवाल मोती तथा मणी आदिक पयह्‌ कर मे ९. महिनो के बाद लाम्‌, रोहिणी मे (पूर्य ग्रहण) हो तो कपाप्र रुई सूत आदि के संग्रह कएने { ° महिनो के वाद्‌ खम कनतु नन्दरमा के दण मेँ यह लु नही, मृमरिरमे हो तो मनीड खख क्षार कसुम्भा आदि के प्रह: कसे से १० भहिनों के वाद्‌ खभ) आष्रौमेहोतेो षत के संग्रह कर नेति 4 माप्त में लाम, पुनर्वसु मे हो तो पै के स्रह"करने से महि नौके बाद छम्‌, पुष्पम होतो गेहं के संग्रह करने ते मदिरो दमम, ओर अष्ठेषा मँ होतो मुंग संह कले ते गहने से लम हवि

मेषा चवुषटये चोखाचणकः खलु

चित्रायां युगन्धर्या मासोलामद्रयान्तरे ८९

तरिप्नवमिरमाततः स्वातौ साभ स्तथातया )

विश्षातार्यां कुरित्येभ्य; पण्माते छाम सम्मघः ९०]

राधायां कोद्राह्लाभो मासैनैवभिराप्यते }

ज्येष्टायां गुडखण्डदेः पञ्चमात्ते घनोदयः ९१

अहण मवा, पूरी काट्युनी; उत्तराफाल्युम वा हस्तमे हो तो चव तेथा चने के प्रहसति टाम, चतरावा खातिमेहो तो जवार वा बान कै संग्रह से महिनो से खाम्‌, विशिलार्मे हीषो कुव्यी के ग्रहस्ने महिनो ते म, अनुराधा मे हो तो केदो धान्य के ग्रह ते९म-

. हिनोते लम ओह ज्येडा्भेश्चितो गुड़ वथा खोड के संयहसे५

महिनो मे छाम हेषि |

1;

सन्दुखेभ्यस्यापूञे पृपापां भ्वेतवश्तः

उपायां श्रौीफासुग्या सर्वर मास पञ्चकम्‌ ९२ भरवणे