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श्रीः

~ पेराचिक-कोण्ड {&

~ 59

विचित्र धटनापूणं एक सचिघ्र एेतिद्ासिक उपन्यास

ऋष्रणपफपः उतादि, इत्यादि अन्थोके ,रचयिता दरा रचिते

"नकन

, , किसे काशीसय, ' उपन्यास पहारः आरफिस के अध्यक्ष ओर्‌ अनेक उपन्यास के रेखक कशी-निषरासी

चावू जयरामदास शुप्तने भक्त किया

[गी रिय

( इसके सर्यतोभाव का अधिकार प्रकारक ने खार्धीन रक्वा दर )

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व, अन्द्रप्रमा भ्म मे मेनेजर भुरि गोसैणङ्कसटाटः दाय मुरि 2 + लेथमवाद २०५ ०] अर्ग॑सति २१४ ङ. ^ गद

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पराचक्‌ कर्ड |

प्रथम परिच्छेद | दैव-~रक्षा

प्यीतनहाष्टौल सणरषस्या को एक सन्या पकतीण होते हुए सान्ध्य-प्ररूश्को टूर करतो द्द्‌ रा्चि कते उन्ततिशथीड अन्धकार विषूतार करतौ यी] इस सन्ध्दाके दस कायं मे मालो खाहाय्य होने के लिये षह इख समय फा आजाकाश्च छअकामपयिकू सेयसाला से साच्व्टन्न य) समयं ससय पर उस सेवमा्ा सै गज्जन जीर चपला फा अस्यायी प्रसाश प्रकट होता था, शंठ्द्‌ की अपेक्षा प्रष्ठा से अधिक दुत~गासी एने की वजह, प्राश प्रे दिखाडे देता, प्रकाश्या फे निकट या दूर्‌ एने फे परिमाणालुशपर शीघ्न या विस्व से शब्दे पीर सनाद देता था 1 ्रमावस्या फीस हौ यह्‌ सन्ध्या जिस राचनि के लागमन फो पूठ्वं सूचना थी, भारत छी उख रानि छे चनान्यकारमयी हेनेष्े सस्वन्धमे फन

सन्देह फर सकता धा! ठी टी दख सन्ध्या कति उरन्यक्ार रो उख उनयय्त भारत-साक्षयानी दधी अपम अणन प्रदीसो द्भासा दूर कस्ते फायत्नरट्र^रडी भौ 1 हतम भअद्भरेने रे भी वनी सान्रयानी दिली रे भविष्ठित री > मङौ; भ्न्तिच्वयी दिष्नी ओौर यथी द्धी मै कोद सोख- द्ष्य गष] उन फी दितौ प्रञ्वश्ित प्रदीपमादासाश्फाभ उख समय क्षी दि्ी लिस्मघ~यगनसेर्दते इष्‌ पूणं राश.

1 4

1

चे चिक काण्ड

1

भक भगे

धरं छी प्यासी ज्योत्छा पी) ठप छमय सृगल-सनखष्ट्‌ छीर्डुभेय खा खौभारय-सूयं जपनौ मच्यन्ह-रेशा के ममोप पहुच चुरा या ओर जौस्दजेव के मभाव-प्रामरादसे ल्ली जितनी अच्छो वन सकती यी) चतनो भच्यी वनी पी अीरद्धजेव पक सुसदुमान मुताष्िव के चिकित्सक फारसी - सी इहान्त बरनियर ने अपनौ पुष्क भारत-यात्रा सं खसं समय कौ दिक्ली देख) उसके सम्बन्धे ठोक ही दिखा ६, फि वह उत समय केचेरिखि जण्दि नगर्यो किसी तरद रम लहे थी उस समय रो रसौ सुख-विलसित हस्म प्राखाद्‌-श्गोसित वराङ्गना दिल्ली अपने असंख्य प्रदीप्त छे प्रक्षाशत्ते उख खान्थध्य अन्धकार से स्म्टु पव्वकद्रद् फरने फा प्रपतन कररक्ी यी क्तु मदाप्ररुत्त फौ नहाङीला पे सभ्पुखटषहर मान वीय माएनसप्रस्रून उपद्‌ग्न अविक समय तक न्द्र करनहं खकफते एन दिनं वैन्ञ(निक श्ट मनुय के बनाते भति भाति फे उत्मोत्तम उपाद्‌षनोको कनी नही; किन्तु कौर तप्ये कि इनमें कौनखा उपादान प्रकृति के उपादान से ट्छरुरकतेने मै उसथे हुमा ६१? भग्ल जगत्‌ इतने तरद्फे प्रकत्थ मौलूद्‌ हि; किन्तु दनम कोन सा प्रकाशरेषा है, छो सूय्ये-प्रकान्च की तरद रद्ध को वदृरङ् होने से रोक खकूता दे? जाज जगत्‌ नाना प्रकार फे जदाज दि्षगड देते है, किन्तु द्धनने कौन जडान शुञ्ध खागर-सलिटर निसतद्भ रह उक्ता हिण्तमी ते चख दिन जगत्‌ कासषस्च यषा जए दण्द निक ' सागर रौ उत्ताल तरङ्गे पठ ~ धूम उपाद्एन प्राङ्तत के

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देव-गक्षा]

गि 91

उपादान से टद्ुर ङे क्मौ ज्यो षहो नही चकते उस दिनि दिद्ली नगरी फी प्रदोप-सालाके उसप्रकाय की भी टरेखी ही दश हद देखते देखते मेचमाला मौर भो खचन हू; वायुं के प्रचर शोके चलने सगे, दृष्ठिहिने खगौ, रष्रह कर मे गज्जेन ओप्खीद्‌ामिनी की चनकप्रग्ट हेभ्नेरगी। शसक फएठसे दिल्ली के वाजासे के भयिकाश प्रदीप बुश गये ' आल्पाश्च जे प्रदीप दच गये, उना म्रकाश्च चृ्ि-नछु छी धुचरौ चादर भौर उस चार अन्धकास्मयी रजनौ क्ते फाडे जाव णसेआदृतदहिाब्रहुन हौ उष्टे चरेम खोमाच्टु इभा \ द्रा पछ यद्‌ हु) कि दिन्नी कौ गदियो आर सादत फी कौन चाये, शादु-रष्है भी अन्धकार मयी भौर लैनशन्य ह्ये गद्ु 1 रेखे समय दिष्ली कौ एक सष्ह-राह से किनारे वने मार. धाषह--पति मष्ारयाज यशथवन्तसिह रे विशा प्रार्‌ फे घ्री भाग फा वहुत बडा जीर वहग्डो खखज्जिन घद्ध- मरमर का घना एरु कमरा ब्रहुसंस्यरु बहुमूल्य शादो भीर पानूसो के प्रकाश से प्रराशितदहेग्रहा धा | अगज दिष्य के जधानी वनते पर उशमे वहतेरे देशी नरेशं अपने प्राखण्द्‌ वनवाने पर उद्यतनहुए दहै यह वात नदे नहो; बहुत पुरानी है) शौरङ्भुगिष को दिघ्लीमें समय फे प्राय. सभी बडे वदे देशी महष प्र्साद्‌ घने हुए ये! उसस्तय भारतं श्राप म्रत्पेक लहीपाखषकेा यपे कर मास दिद्लीमे रहना पहता याः। कितनेष्टौीमदौ- पालो केष दिष्घी फे किडिकेष्धार् का पहूरादेना हेता या, कित्मेष्टमी महीषालो की बापिंक खेद डे दिद्ली-पति क्ते खम्मुख उपस्थित हिना पडता चा ! कित्तने ही महौपःल्‌

पेशाचिकः काण्ड मा सच्र्॑ट्‌ फे सम्म भपना अभावे-अभियेःग उधर्वित ऊरने

सिये दिल्ली जाया करतेये। दस्त तरद किकी .किसी कथ्यसे चपेनें एरय कर्‌ वैर भारतीय संषठीपलौकेा दिन्नी जानां छो पष्टता धौ | जीर खारनार दिक्ली लाने छी वजष्ठ, स्लिरप्ये फे सक्ानों या भित्रोंके पराषाद्ो मे रहने फी असुचिघा से बचने लिय, दिल्लीमे उन रोगोने अप्रने अपने प्रनाद्‌ वनघ्रा लिये ये! दिल्लीपति भौ रेखा ही चाष्ठता था, जै महीपा दिल्लोमे अपना प्राखाद्‌ वनवाता, उसने उसके हस छाम के लिये अपनो कहौ प्रस न्ना प्रकट करतः था, फलनः, दिद मे वने देशो राजन्यवगे के अनेक प्रास्दौ अन्यतस मारव्ड-नरेश महाराज यशवन्तखिह क्ते प्राखष्द्‌ कृ हरो भाग क्ता एरु कमय ठस सञमप श्ररुशाधिस्य से अत्यन्त प्राशिता रंह्या कमरे मे क्हुन मोटा ओर उड पी वहुमूल्य एफ रलो कालीन विद्धा चा।उखष काङोनपर मणिसुक्ताखचित जीर एक छोटा कौन अरर कदे मतचद ये | वयथोदृहू णण्न-ग्राद्ी विद्या परेमौ सहारन यशवन्त्सिष्ट दष समेट फप्लौन पर धेद एक सनद्‌ पर शूक हुए ये! उनके दरदं गि कित्तने ही राठौर वोप्विठेये ; समने एरु गवय्या वैद प्रा, जो तदूर पर ऊद पक्क गानण गा रहा था ! महुपरप्जं छे प्स ओन््ुजेच राको दुरषारौनलणा } फरीद देशी र्षण भौन या \ केव्ठ स्मय नष , न्य खमयमंभी भौरष्ुमेव छे निक्टवर्नो पुर्व मष्टसाजङ्ते पास सष्ते नये भौरद्भुनेव म्टारा्ल रः अपना सौर शन्न समना वा ; उपद््सु से नन्हे "सनन? युरू भ्र

चेष रक्षा) पद

ती पि पिपी 00५ ग्मिणीीीणीिीी

रि

यश्चवन्तिंह या सूचन यद्‌ चासो भेर चोर नुद परौ. तीनो काफिर मेरे उद्ाराशय शन्न £; पयोभि सुखे सख कर शन्गुत करते ; काफिरं द्ुतन मेरा सद्धणै-चद्य' शुदे; क्योकि सु्से गु्ठरूप चेशनुता किया फंरघ् हे ' ° इख तरह सूरन को ओीरद्भजेव भपमा गुप्त शच्च घत्ताया करता या सतन पो पना सुप्त शन घत कर भो आीग्डूजेच दण्ड इसलिये दग सक्ताणा, किण्छष्ी सूतन अघस्य वीर राठौसो का भधिनायकरू या; दूंखरे वइ भाानी से अपराय प्राणिन किया कए्न सकता घा) जिन नष्वाराश्च यशवन्तचिष्ठे के प्रवि जीरकङ्गजैव का भ्व चा, उन सहाराज यशवन्तस्सिहके पाख ओौर्क्ुभेव छा कोद प्रिय पाति कैवेला कताय? इएसीष्ठिपे महुष्राण खघ दिग स्ते ये, तव उमते सिखने, उनडे पाव भीर- तेव निकटवतीः कोद मो मनुष्य सायाकरता चा। ष्ोदश्डे्ट प्रर सक्ि जाने पर्‌ र्ना खमा हज) सषगरष्न फे श्ितने द्री शरदार त्था दृरयारी इत्यादि सष्ए्राज से आला ठे कमरे से चदे गये केवल दौ चयौ- टु विश्वस्त र्दौर वीर महुारप्फे पास जडे र्दे उस सभय सूसछधार वृष्टि ्मीरहौषी ! तौक्ण चायु-प्रवाद्‌ रोकने फे लिये कमरे के प्रय सभी दूर घन्द्‌ फर दिये यथेये। पिरथी, फभरो फभी वादु फारोद प्रचर कम णाः न्द दतै को चेग से दिष्टा, रमर के काह मीर सूरं मे जती मोमवत्तियो कौ श्मिः देता या) यश्थवन्तसिष््-बष्ी हौ दष्ियात राच्रिरै। एक सरद्रर-खन्ध्या सेवृष्ि नारम्म हुई ॐ, भौर "त चे भय तक इसका येग घटने प्ते वद्र प्रदटता गथारै।

वेक्ाव्विकः काण्ड

यश्घन्तचिद-जौरद्वजेप के शितने भषट्रान-पत पाने ेवाद्‌ जवसे ष्ोददो सधा पष्ट नने योचपुर् डे दि्ली के दिये अच प्रख्यानक्िपा चा, तथ मेरे च्छते खसय सित्रव्‌र्‌ क्स्पत मुरन्ददप्यने भुस फा या, कि वर एक यादौ सप्ताह वाद्‌ मेरे पाख दिल्ली पटच जाये सुभे दिष्ठौ जप्ये अन पूरे पन्द्रई दिन वीति; उस अव सरपेनतो मुकुन्द अष्ये उनका कोद पचर छी साया, दूखरर सरदार मुङ्न्ददास्जी किसी त्विष प्रपोजनं शे अभ्मी तक द्विष्म पुव नदी च्छे दँ; अप्य दे) प्फि श्णीघ्र हो य्ह अग प्ट्ुयेगे ) यशादन्तःसद्-उन्ह्यौ ने अपने भाने का जो सभय बताया है, उका अन्तिप्र दिनं अष्जलहै ' मेने भशि कौ थौ कि भाज वर सवभ्च भार्चेने ; सिन्त सन्ष्या मे जेखी वृष्टिषौस्होरै, उससे जानपडता है, षि वङयदि दिक्लो ससौपरभी पहुच गये दुगे तो भाज दिक्गी प्रच कर खकमे। दूसरा सखरदुार-क्यो वम्मोवतार { क्या इख वानकी कोड सुचना सिचौ, फक जौस्द्धनेच नेजाप फो इतने लाग्रह्‌ चे दक्षौ सयो चुनाया डि? यश्यवन्तसखिह-जिस दिनि भे यषा लाया, उसौ दिन जपने आने कौ सूचना मने आीरङ्जेव करो द| वह सूचना पाकर मौ उसने सुरते भग्ज तक अवने पाख नहो बढाया हि खस्भवन शोधन ही वज सुकते ह्ुलावेगः भीर्‌ सुभे मेरे दयुखप्ये साने का कारण प्रगट करेण | पष्टला खरद्‌ार--मगयान से प्रायेन है, कि वड्‌ दख भवी मेटम सटौरो का महर फरं। यश्चवन्तसिद्‌-(सुस्कुण कर) जौरदङ्‌मेव मेरा ननैखा भिन्न

#।

त्क

देव-रक्षा | ५. न्व हे, उखे तुम जानतेदौ) रेच मित्रभे मेरी रेदं, क्षोने पर राठौरो कौ लितनी कुर्द सक्तो ड, उतनी दी हौमी।

दोनो रद्र दों निश्वास परित्यण्ग फर निस्तञय हुए 1 यथवन्तसिद्‌ भी -निर्तठ्य हए कुठ देर निरुतठ्ध रहने उपरान्त अन्ते यशवन्तसिहने उठ फर्‌ कह, लघ अप्पषोग नी जाये ;मेभी जाता ।'

दोनो खस्द्ार सलाम करकमरे से च्छे यये। महारात्र के उठति ही कमरेकोा एक दार दुला उस्खरे हृएद्वार फे सामने चार स्त्रियों यही द्दिष्वर्‌दी एनमेदो हप्योनें नही तवरे यी अवशेयदो स्तिभोमे एरर ्प्यमे एक जछतो हदे मशाखजोर दूमरो के हाधमेपूर लुणी हद सशारू थी वह वभय इरे सशर शीघ्र शीघ्र लाद नार्हो थी, किन्तु व्यु के प्रचरड फोको के वर धार अने फी चज जलतो यौ ' यह्‌ चारो स्त्रियों द्र पर खष्ठी महाराज कै उठने की प्रतीक्ला कररष्मी यो | मह्परष्जल फो अमे वदने पर उद्यत पर, तनमे एर प्रदम स्वी जे नना पल्वे निवेदन फिया,-^पृच्वीनोय ! वृष्टि से भोय से वचने के ल्यि तासदान यषा से हटाया घ्वारूर अन्त पुर की एक फोठरीमें रखा गया है। मेँ अभो पाकर उषे सिवा छाती हू,

यशघन्तमिह-- नष्टौ, तामद्‌ष्न का प्रयोजन नही, में चेद द्धी जारण दूसरी मशाल कालानि का भौ प्रयेाजन नष, एक मथा का श्रकाश यये है

यदङ्‌ कड मह्यररज द्वुग्र चखमीप अये पुनर्मे एक स्छीने श्नागे धट अपने वस्त्र खे महाराज का वहुष्ररटय सूता निका उन्ह पकना दिए मह्ग्यज कोठरी से निरू

वेशाचिकः ऊण्ड।

[ककव र्कककककककणकक कठ कककककक कक वक निनि (व

यश्ववन्तखिद्‌-भौरहुेव के कतमे ही आादून-पन्च पाने छे वाद्‌ अवसि रोष दो सुष्ठु पडे भने योच्पुर्खे दिल्ली के लिये जव प्रस्यानि क्थ था, तख मेरे चते खय सिजय्‌ कर्पावत सुन्द ने सुखे कहप था, कि वड एकया दो सपइ वाद्‌ भेरे पाख दिल्ली प्डुच कप्येगे 1 सुरे दिल्ली ज्ये जास्त पुरे पन्द्रह दिनि वोते ; इष अ्व- खरपेनतो मुषुन्द्‌ स्ये उनसर कोद पत्रो आया दूसरा सरन्ार-मुचुन्दद्ास्जो किसी त्वि प्रपौज्न खे अक्षी तक दद्ध ष्च नष्टौ चक्षे हु; जथा दे, शीघ्र मी यां जा ष्डुखेगे यशवन्तःसह-खन्ल्यो ने अपने जाने का लो समय अतष्यष ह, उका अन्तिम दिन अष्ल रहै ' सेमे भष की यौ कि भाज वद अवध्य ज्चेगे ¦ चन्ति सन्ध्यात लेषो विष्टो रहौ है, उससे जान पडतगै, पि वड यदि दिषतः समोपभी पहुंच ग्येखोगे तो माज दिल्ली प्रवेश करन चकमे | दूसरा सरद्ार-क्यो चम्मावतार | क्या दख बान दङी फो सूचन निरी, फिओीप्ङ्नेन्र नेजाप को तने लाग्रह्‌ खे दिष्ली क्यो दुन्ष्यप्दै? यशवन्तसिह जिम दिनि सरैया जाया, खी दिनि अपने माने कौ सूचना जैने आौरद्भूञेव फो दी। वहु सुचना पाकर मी उसने सुरे अष्न तक अवने पास नदौ दुखाया दे! म्भवः शीघ्री वड सुेकुलावेगा भीर सुशूषे भेरे बुख्ये लाने का फार्ण प्रगट करेगा | पष्स्या सरदार--मगवानसे प्रायेना ई, किव ङ्स भष मेर रप्टौसे का महद्र करे 1

यश्चय-तचिद-(मुस्कुरा फर) जौरद्गमेव मेरा भदा भिन्न

#

देव-रक्षा 1 ----------------------------------- हि, उखे तुम आनतेष्टो 1 रेषे मिनन मेसो मेर ने पर्‌ , रग्ठीरो कौ कितनी कुशल षौ सकती ३, उतनी ष्म होमौ

दोनो रद्र दौ निश्याष्ठ परिल्याग कर निस्तठव पशचन्तखिद््‌ भी निस्तन्व हुए 1 कु देर निस्तठ्घ स्मे फे उपरान्त अन्तमे यशवन्तसिष्ठने उट कर्‌ फु, छव अग्पलोग भौ जाये, मेभी जाता हु | दोनो खरद्‌ग्र सामे कर कमर से च्ठे गये! महाराज के उरते द्धी कमरे का द्वार रुला उत्त खुले इए द्वग के सासने चार स्स्त्रियां रखष्टी ददिष्वारईैदीं ।! शनमेदो ङे छए्योमे नज्गो तख्वरे थो 1 अवसेषदौ न्न्निषोने एरक इप्यमे एक षती हुई मथार दृसरी रे हाधसेएुर चुभरी हुदै मशाल थी | वह बुभ इदै सश्र शीघ्र शोध सखा जर रही यी; किन्तु वयु के प्रचरु शोको के वार यार अने की वक्नष्ट जले नं यी यह्‌ चारो स्त्रियां द्वार पर खडी हौ महाराण के उठने कौ प्रतीक्षा फररहीयथी। सहगराज फो आगे बढते पर उद्यत्त पा, षममे एक प्रहरी स्वीने नखता पूठ्वंक निवेदन फिय,-न्पृथ्वोताय {वु के भोकीं चे वचने के कल्ये तासद्‌ान यषा सि हटाया खाकर अन्तपुर की एक रोठरीर्मे रखा यया है) मैं अभी खाकर ठे सिवा खतो" यशवन्तसिह-- नष, तामद्‌ए्न का प्रथन नी, में पैदल षी जाद्तेगप'। दूरौ मशाल जलन्ने फा भं) प्रये'लन नष्टौ, एक मशाल काः अ्रराश ययेष्ट 2 यहु कर मष्टाराज द्वार फे समीप भाये ¦ इनमे एक ख्रीने नागे घढ अपनेदस्त्र खे मद्ाराज कानबहूुप्ररय जुतता निका उरु पना दद्या महाण कीठरो से निकल

गै

पदाति फाण्ड।

छन्त पुर प्री ओर चखे | एक प्रदरो सनी उनके आगे चखी एक पीडे | जिन दष्द््ियोङेद्ाणो मै भालं थी, वह्‌ अगे चलनेव्लो प्रहरो स्त्री भौर सषाराजकं यौचर्मे चली उस समय बु प्रचठछवेगसेदि रही धी, भधर जटकणवाही अद्र बायु अवन्या वष्टा प्रकोप भ्रफट कर्‌ रहर थौ इख कमरे छौर अन्तःपुर के वीचफा सद्भीन पय ्वौटी रघवे छाच्डादित रहने परभौी वायुके कोके साय जानेवाङे वृि-जलसेम्मीगर्हा या! पदको देनो भोर छत के छज्ञे से जसको चादर शिर र्ीयी। उषं ष्दादर पौरे राचि षका घोर अन्धकार खाया या भहा. राज ने ेसेहौ कमरे सेपेर निवारा) वैसे ही दूर एष दीक हदे, साय खाय मानेषए कमरे कं ठीक ऊपर आकाश मे चौर मेध-गन्जेन दुभा यदह अश्कुन देख भषहाराज के सप्यको चारो खियां रुकने पर उद्यत हरै, किन्तु मदव- साषाकोन रुकने कौ वजह वहसवभीनर्की, उनके साय लने पर वाच्य हद्‌ पूर्वन कमरे जौर अन्त युर के वीच खत पै च्छादित ज्ञा पथय या, उसकौ छम्बादै पो एक सौ गज यी | यह पथ दही अन्तपुर जीर बष्ह्रके प्रसाद्‌ को जाडता तचा पथक्‌ करता या इसके देष्नो पार्वंमें शस्प्रवत अल्प- परिसर दे सेदान थे देषननैदानोके छोर पर राजप्रासाद्‌ यौ सीमा रेखा ऊँचौ चहारदीवारी यी ।२ेसे ही इन देार्नौ मेद्ानो फे वीच सवरस्थित रष्ट से ष्वारो स्त्रियो के साय महए्याज अभी फदर बीख गल्ल अग्रसर हए ये, रेखे समय रागे चलनेवाष्टी वष्ट अरसी स्तनी र्वी अमीर ठष्र गद यश्चवन्तसिह--षयए् है `

४२।

1

दधे रक्षि |

95 शक ककय 9 का

स्त्री-महाराभ { सशालके प्रठाशमे मसते पेखा जानं पठः, माने कोड मनुष्य इख पयके समीप सैदान षमी छोर चला गया `

पर्‌ मगण्ठ ऊंची षी ग्द तसं प्रहस स्त्री निष मोर मशुष्य का जाना बताया था, उत्त ओर खव ने निगां दौडादै पीडे चल्नेवाली प्रहरी स्त्ीने राह फे किनारे जा आंखें फूड, उत मनुष्य देखने का यद्र ष्शियए 1 किन्तु किसी रू किसी यत का कोद फले हजा। मशालके प्रकाशे अकाश मे गिरती हुई वारिधारा फा सयोतिम्मय जल भोर उसके पीडे के चेर अन्धकार के सिघग शिषो को अभीर कुड दिखाई दिप, उसं चोरः मन्धकास्मपी रसजनम, उख एरु मशाल कैप्रकाश र्मे, अपने से द्श छाथ अन्तरकी भी पफिखी चीजका देखना दिन या फिसी के यललका कोद फलन देख महाराज यश्वन्त- तिष्ट ते अआगगे चलनेषारो उख प्रहरे रत्री से कहर,-- “तुभ श्रम दुभ है मे वृि-जख्से मीग रहा, शीघ्र भागे ददम चाद्ये |“

चारो स्व्रियोके साय महारा्ल अग्ने बडे उस समय वहाः भौर फो गब्दु नही, केवल वृद्धिका शब्द्‌ सनाद देत णा | कभी कमी चपला कौ चमक उत्पन्् हेि।ती यो, सफ याद्‌ मेच-गज्जन हिता था! महाराज अर चारे सिजिरोने उस पय का दुं भक्विकम करियप या, एसे समय ख्डे येग से चिजली चमकी। पथके र्षु केचोर तिभिराच्यत नैद्प्न प्रकाशित हुए प्ररुयकेदेतेहौ सष्ाराज की दृष्टि उन सदान षती भोर गद, जिसमे किसी सलुष्य फे देखे नाने का सन्दह्‌ क्षिपा याचा दष

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[षषी विमि

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भज)

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विद्यत्परभासें महाराजे देखा, कि उस मेद्ानमेउन- के चमीप दये एक नर्द, अनेक मनुष्य-मृत्तिर्या उडी है। न्ह केवलं महाराज ही मैं नही, चउन्फे साय की उन स्तर्थं नेमी देखा 1 विद्यत्प्रकाशथके खाप हेते दही, वहं मचियो भी खाप हि गदे] जामे जाने वाली प्रहरो स्त्रीजने पुकार कर कडा, ^“ दीहो, दौष्ठो मथार छाओ।

इरी स्त्री के सुहस्चे यष वात निकलते हम रमर गुञ्धुन जञैमे कदै शब्द हुए जिससेदानमे वह्‌ मनुष्थ-सृतियां दिखा दो थौ, उस्तनैदान से कितने दै वौर आ, महा. राज तथ उनके साय को उन स्स्विणोषके सीच से हैत्ते इए उस दूसरे मैद्ग्नमे निकल गये। एक तीर भागे जाने चालो उख प्रहरी स्नीकीदेहमे विधा वह चीत्कार कर वैठ गद महाराज्ने अ।ज्ता दी,-"मशग्ल बुषा दे 1** जन्तु यष अआगच्ा कार्यम परिणत हिषे पार जेसेद्ी सशाख्चो सी मशाल बु्ाने चलो भके दमी वृष्टि जलल से भोगे हुए दौीचेरायकः सशस्त्र मनुष्यो नेमेदानसे उसपथमे एश एफ प्रवेश रर महाराज आर्‌ उनकेसाथ फी स्त्रियो परं तलवार खे आक्रमण किया) मशग्लफेप्रकाशमेउन छष्ये का आकार प्रकर पटठानो जैसा जान पडा। एरु प्रहरो स्त्री पडे दौ आहत चुकी चौ, ट्री ने आगे बड एक मनुष्य पर तलवार का एक वार कियः। शसफे फल से उखरु) दहनी कलार यहूुतं कट गहै उस. फो दष्हनौ म॒ही से वन्द्‌ लल्वारका सदः खिसक गया, तख्वार्‌ व्डेखेगन्ते खड्ीनपय पर गिर) चडा शब्द्‌ हुभा। तपर जौर एरु मनुष्ये आक्रमणकारिणी स्दी षी यग मे ना उसके शिर पर्‌ तलघ्र मासी शिर कूद

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दैवे रक्षा १। न~------------------- ~ गया; स्त्री अचेन हौ भूमि पर्‌ गिरी 1 मशालचौ स्तरा धष्ीद्दी सन्ठतासे नाक्रान्त- अर अआणहतदहो राह णिसो प्तिखस्ती के हए्यमें मशणट यी, उसके गिरने पर मशाल भौ गिरो जीर घौर धीरे बुभने,ख्गी 1 दौ मनुष्यो मे मख सहारन यशवन्तसिह पर आक्रमण पिया | वयोवृद्ध मारवाह-पत्ि के पासं एक तखवार चौ उन मनुष्ये षो देखते ही महराज ने अपनी बड तछ्वर भ्यान से निह्षखली धौ जैमेद्ी ठन दोन मनुष्यो समी तलवार महारज पर चली, चसे ही उन्घो ने चैतरा बदल उनके दोन वार खाष्छौ द्यि जीर अपने आाक्रमणक्रारियोसे एकुष्ठौ पीठ; दूसरे को कभर पर भपनौ तठवार कावारं किया \! महाराज फे दोन आाक्रमणक्ारो आहूत हुए ङ्ख अवसर मे अन्यान्य मनुष्व भो मष्ारात फेखाय फी स्त्रियो कौ अरस निश्चिन्त हो महराज परअ दटे। एर जर भक्ष्ले वभोवहधु सह्ाराज, दूसरो ओर पाँच वलि सौर ्विशाखकाय यवन हुए { खडा यवन भमपनी दुर्हनी कछार छट जाने कौ वमह दस आक्रम्णमें सम्मिदितन द्यो दूर खड हौ तमाशा देवने यः वद पचो यवर पूणं उम से सहाराज पर आाफमण स्ते ये उने आक्रसणकरनेषेद्द्गु से ज्ान पठता या, कि दह यया खरूभव शीघ्र वयोवृद्ध नहारान की हृत्या कर. ने लिये अतीव उर्सुरु ये। मारचह-प्रति गोषृद्धु योषु -अषहाराज यशचन्तसिद भोप्रणसट्भठ उपस्थित देख, अपने खारे शक्ति-सामभ्ये से अपने शन्भोके वार रोक रहे ये। तनःष ही नही, योदा मौ सप्रय पातेषु) वह जपने आक्र मणक्ारियो पर्‌ व(र फर उन्द आष्टत फरते ये ¦ एसे खमय

"१२ पेद्वाचिक काण्ड ! ~~~ एक दुधेटनप इद 1 सहारा केष्ाय धमि टयार जितनी सन्दर थी, उतनी युद्धौपयोगे यी | एषका फर यहं इञ, पि यत्नजं की तलवास फी चोट वह शीघ्रो छाज्जरित हद्‌ जर अन्तर्मे वीचसे टूट गदे 1 उका अद्भास टृटकरभमि पर गिण; अवशेय अद्ुगश सह्या हुष्थ्मे रह गया महाराज समभर गये, कि सदं सनष ˆ हज ; उनका अन्तम समय सन्तिकट है खन्धे ने अपने ह्य खी उख खेरिडत तख्लार कौ अपने उमीध के एक श्र पर खीच सारा जीर अतीव ककं स्वर से काः ^ ुत्यषरौ { अव तुम निःश््ुष्ो मेरी हत्या करे >

य्ह काक्षित सुंअवल्तर पर महार कै वड शन्न उनको हत्प्पकरमेकेजभिभ्रष्यसिउनपमो जोरयव्डेउरसाह रसि अयसर इप्‌ 1 एरुक्षणमे सहारा की दे छक्यं कर पोचतठवर्रे, चायु मे उत्यित इद पेक्ष समय सिद के इुद्धुपर जैसा हुङ्धार करता विशथालवक्ष खव्वौवृति स्थूखकाय चदु हु दाढी भौर वटी सूखोवाङा एक भीषण-द शन सशर पुरुप कमरे की जरसे जग सष्टाराज अरर उक्ते उन अक्रमनणकारिर्यो छि वीच सखौ ग्य 1 वह अाक्रमणकारी इस नवायत मनुष्य का खन्वौङ्ग जभौ जच्दी तरह देखनेभी पाये ये, रकि उखने भपनो तखखवार्‌ चटठर उनसे एक अाक्मणक्रारी की कमरे दौ दुकरूडे किया, भौर दूसर का शिर उसकी देह खु ददिया | दुधेनो आक्रमणरारियो की देहं चमा धम राष्रये गिरे! दो अक्रमणकारियि की सार दु भदथ तन्ये आाक्रमणकारियो कौ ओर वषा | किन्त नतेन उठे खम्गुख ठरते का उद्व फर्‌ संक खन

तीन्तेजे प्रलायन किय, उत्क साथ दाथ ठुर खडे चनक्षे

= चः ` ~

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देव-रक्षा ) १३ उस साथी ने भी पल्यायन छया वह्‌ सव जिस भदान से ञमयेये, उसी मैदानमे ठे गये राति घोर अन्य कार मे उनकी सृत्ति शीघ्र ही चिप गद , दृष्टि शब्द्‌ न्त उनका पद्‌-शन्द्‌ शौघ्र हौ निट दिया 1 उस नवागजुक सुप्य ते उनका पौठाएकरने का यत्न किया ; किन्तु महारा ने उसे रोक कर कहा, “मुकुन्द { घडे जवसर पर पहुच तुमने मेरी प्राणरक्षा फटी अन यषां डहर श्र मेरे साथ आभो) - मुक्ुन्द्द्ास का हाय पकड सहारात्न शोपघ्रता पुव्वंक बह पय सतिक्रम कर भन्तपुरमे पट्ंचे दृष्टि-जल फा प्रवेश रोरुङे के ्टिये अन्त्पुरफा विशाल फाटक वन्द्‌ कर्‌ ्िया गया था; उस बनी एक पिकी सलौ थी; यदी स्छप्य्ण या सि चष्टर षौनेदासी सर्र कष्ट का कोडा. हल फाटक भीतर वैरे पएरेद्गसयो अर पहरेदाप्मनि को खनद दिय 1 फाटक के भीतर दाहिने जौर वभय जी खड्ीन द्ालार्चँं वनी थी, उसमे एक भफ्चरफी भधी- नतामे शोर पचस सस्र राजपूत जीर बहुतरी सशक् प्र्री प्रिया निश्थित मनवे वैरी यो मुढन्द्‌ कै खाय सष्प्राज कि एकाएक पाटकमे प्रवेश करने पर, म्द देख पर्हेदष्र अर प्रदरो स्िर्णा सस्थर पूरु्घक चट सष्ाराज्ने पष्ठरेद्ग्रो फे अफखरक्ो जपने समीप बुाकर कहुा,-^ तुम्हें फु अपर सावचान्पे साथ पहरा देने की नाव्यक्ता ह! यदपि वृष्टि क्षि शब्द्‌ भौर फाटक वन्द्‌ रने से यष्ठीं वष्र का पोटा शखिन्तामसे पङ्च खषप्ताष &ै, चयापि सुर्टप्सै धरवणेन्द्रिप थद्दिष्ुञउ भीर त्तीक्ष्णष्टो तो भच्छा & 1 षस पाठके खमीप एी फमरेषफी जर णायै वाढ पयर भसे कुउष्षण पडे ष्टुत वह एक रण्ड

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१४ पेद्राचिकं काण्ड)

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गयारै 1 कमरे से निकट दस फाटक ष्टी शोर रषा य; रे घ्य पथ फे उत्तर के नदान से भा छ! यनो ने हसपर भाक्र्नण कयां मेरे सायको चात रस्जिर्थ चराशायिनी देहि ; मं र्वही विपद मे पंसा ; ( जपनं साथी फी ओर सद्ेत कर } मिच्चैवर सुद्कुन्द्‌ यथां समयं भौ दै यवचनो को मारअर्वशेष यवनो को यदि भगान दिते, तो नेत भए्ण-रक्तः नं हरेती 1 तुन छोग यया संन्भवं शोच्र घटन स्यल मे जाओ रच्य-वैद्यकोवुङ स्त्रियौ को दिखाओ जोर दोनों कवन की भवद्‌ कौतवालो छे जा, कोतवाल छो षस दुचैटनः की सूचनां दौ | िवा इक पय के निदु के दोनों तैदान सौर अन्तनपुर्‌ तया वार कै भन्यार्न्य स्यानोको देख, एस वात फौ जोच करो कि आकमणकीतती संवे यमे कहा गये 1“ - सहारा फो यहं बात समाष्ठ हौतेष्ठी भश्च डे कितने ही सिपाही फाटक से द्षाष्टर निकल गये दृष्ि अवं चट रषी यौ {रलये सिपाहियो को महाराज की भान्ना. पेषछन करने भे अंधिंक छठिनता नं इदे सिंपाहिर्यौ ` पने फे उपरान्त नहाराजने सुकुन्द्‌ से पृछा," कयो तम भोजनादि निदत्त हौ चुक्षे हौ सुङुन्द्र--दिक्नी मवेश करने रे उपरान्तस्नं यही अश्या कटक पर्‌ घोडे से उतरं अप्प के कमरे मै यहुचा ; लप्पको वहा पा सन्तःपुर्‌ कौ भोरचेखा | र्हं सपं चे भंट हुई महारभ--टौरुहै ¦! रेख द्मे तम मेरे याय सो 1 अपने वस्त्र वरदो जरौर भेर साच भो्न कते “~ यष कषु मुष्ून्द क्म राथ छे संहुषराथ जन्त पु क्छ

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दैव रक्षा) १५

सीदिर्यौ की आर चठे कितने ही प्रदरो ओर मशालची स्त्रियां मह्ाराजफेसाथ चलो | हटो-व्चोः कारव उत्पत भा साचारणत राठौर सान्न रे, विश्येषत सजुक्न्द्‌ से, भन्तपुरमे परदा फियाननलाताथा। अन्त पुरमे प्रहुच भोजनादि से निषत्त हौ भुषकुन्दको खे मष्टाराज एक भतोीष सखजिजित कमरेमे जा चै ) पन इलायची भादि परिपणे सोनेफी रकाधियों टा द्ग्सियो ने महमराज फे सामने रणो द्‌ासिथे को मष्टा साने कमरे से वाष्टर जाने का सुट्ेत किया उनके जाने भीर द्वार का मखमदटी पर्दा वरावर होने पर महारालने सुक्ुन्द्‌ कदा,-“ भाज फे तुम्हारे साहाय्य के लिये स॒मा भैं भाजत्सम कवन्न रहय +? स॒कन्द--महप्याल { मेरे भीर मापके वीच षन वतते छा हना उचित नष्टौ श्रयोज्न उपस्थित होने पर प्राण॑ भमि देफर जापकी अर आपके परिवार फौसेवा करनेर्का भरिने शप्रय श्रहण करदिया सहाराज-- दर आक्रमण्र के सम्परन्धमें तुम््ररा कय चिचार है? | सुकन्द्‌ --यह आक्रमण चौरोने भी नष्टी किया दुरे निमी नही कलिय, ष्डतदिनेसे चतरं लभे दुरात्म^भो ननि भाज अन्धकार जीर वृष्टि का जाय खे भप पर यष्टु भाक्रम्ण कियाडहै। महराज--तुक्हारा कहन्‌ग यहुत ठीक हि मेरी समक्में ग्रह अगक्रमष्युमुगख-वय के उख क्लद्धकी जछा ञे हुमा दै सुकुन्द-भापकी शस नप्तमे पुरु सघलर भौ ससत्य महीं 1 कयृप भाप दसो खि सोधपुरसे दिप्नी घुाये गधेषे{

1६ चेलाचिक काण्ड

सनि कि

ििपििििििििििििििि गककक 9 मरणं

मे समय एक्‌ प्रहरी स्त्रीजने एक रषटौर अफसर के आने की सूचना दी मह्प्यजके चते अपने सामने तुलाने पर उसने कहा,“ महाराज { आपके आच्ानुसार सभो काय्यं सम्पन्न किये ग्येहै चैद्य-रजने वारो स्त्रियोको देख कर कहग है, चि उनके क्षत गहरे नही ; खुचिकित्सा फल से वह चारे शीघ्र ही स्वस्य भौर सवक हौ जायेगी दीन लाश कोतवाली पुंचाई गद्रै उन्हे दैख कोतवाख ने घष्ठा आश्रये प्रकशः किया आौर कहा, कि वहु दोनो छाश शाही शरीर-रक्तक सेना के पठान कसी है। कोतवाल ग्रत काल इस दुघेटना को जच करेगे छन्त परवाङे पथ के गिदृ के दनं मेदष्न तथ अन्यान्य स्यान अच्चो तरह देये गये; कीं फोर मजनवी यय सन्दिग्ध मनुष्य दि्खग्दरै दिया 1 उत्तर ओर फी चह्गर्‌ दीवारौ के एक अश में भोत्तर ओर बाहरदौनोओोर दे खीद्धियर्पं छगी भमिषी &ै जान पठत है पि शन्न इन्हीं खीष्िर्यम रे खण्हष्य्य से अप्य आर माग गते |) मष्टाराल--अच तुन जाओ भौर अन्तःपुर शी राह्म भौ प्राचे दौः

अफखर के जाने $ वाद्‌ एकू खार फिर महमराज भौर मुकुन्द के बौच व्तछाप आप्स्नदहुजा।

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द्वितीय परिच्छेद्‌ | भूर) दृखरे दिन दोपष्टर यष्द्‌ ौरद्धभेव फे एक अत्यन्त प्रतिष्ठित सुषष्टय ने सदप्रा्त यशचन्तमिदह @ प्रासाद्‌र्से रा महराज खे फटा) --"व्थीञ्च चखिये; जहपनषह्‌ नै

भर १७

१५

हि मौ

भापफो याद्‌ फिया ह2ै।» यह वात खन ययाखम्भव शीपध्र धरादि चे सुठज्जि ष्टी, उस सुखाह्ध फे खाय मष्टाराव अपनेष््प्यी पर मवररष्टौ दि्ीके कठि की मोर चछठे। मष्टासयञज फे भये पीडे शहारान फे शरीर-र्ठक सवार तथा घोष पर भौर कितने हौ रारौर सरदार च्ठे। मटर फे हायो 5 आये जगे भावा छगाता चोषदृ्रौ सीर नफीयो का एक दल चषा सं शान से मष्टएणज यशवन्तसिष्ठ षी संवासो उनके मछ से निकड दिष्ठी के किंडे षी भोर ची यह उवार अभी फुरुष्टी दूर छने गदर यी; रेखे समय एरु थारी शरोर-रक्षक खवारने गा, भह्ाषराज के सखाय हायो पर बिठे उस सुखादय से कष्य ,-- "जता हजरत इस समय किले मे नष, चौगान $ मैदानमे धिराजते है मह्या # स्य जाप वही जाये 1, यह्‌ कट्‌यवद सवार चोडा भगा दा गया मष्टारगल कौ सवासे दिल्ीकेकिडिर्मेन जा कितने ष्ठी राखे घूम फिर, किलि नीचे यसुना-किनारे वने चीगानषे भेदान पटूची सपसुना-किनःरे सोते वादी $ खम्भो पर काश्सीरो शोक्ते वस्न्‌ सैर काम फा ना एक सुन्दर शामियाना तना या, लिसके गीष पने कितनेष्ी सुखाष्टवो जीर सरदारोके घीच, एक चाप छूरसी पर भग भ्रतसम्राट्‌ भीरनुशेष ददश \ यहु्तख्यकरू शरोर रक्तक सयपर मीर पोषे, हयी, तामदान आदि विविध सवारियां शाभियानेफे समीप थो भका निम्नेल या; सूस्यै'फी सुखद रदधिमियां कल रादि फे दृ्टि-जल से धुलो यप्ुना-तट फी हरिवयाखी + 04 पट उत्ते लयन-सुपकर घना रएौ

1

पटााचक ४१ण्द्‌

यिनि निवि

शालियाने समीप पश्च इष्य डे उतर शष्नियाभे प्रवेश्च कर भौश्डजेव ष्ठी महाराजे वाम पिया, ओर ठसफो जा वद याख्यान वैडे ¦ दनी वयोवृहु नर पततियों ने एरु दूसरे कफो देखा दोनेनेषदौनो कौ आंखो से उनका तत्कूछोन मनोभाव जानने फा अफलोदय यत्र किया! अन्तम पौरद्ुञजैव ने सुर्ङक्ुएकर' मष्ारष्ज खे छषहा+--"“जाप को मैने बहे अप्य्रह से दिल्ली बुखाधा किन्तु विचि कास्यं मं प्रदत्त सदने के कारणा दसि ते पदे लापसेभेखंट करन खकरा ।)) सहप्रार--श्या भ्रं किसी विओेष फाय्ये ठे खये बुडा्या गया ह्‌, हुजूर { भरीरङ्नेय--न्श्विय षी विशेष काय्यै है; नहीं तो प्ख शोतत-रूाछमे जापको एतना कष्टनदेता। खूब याद्‌ भाया} भाज प्रात कण्ट सेने किसी से खन या पि कठ रात्‌ को आप्पसे कानमे जापपरचोरोने भ. कमण किया धाः श्या यह समाचार सत्यदै म्पराज--विलकुल सत्य | असत्य केवल इतना है, फि जिन लोगो ने सुम पर अाक्रमण कियषए धा, बद्‌ चोर नहो , आपके शरीर रक्षक सवार ये! यह बात मद्रान ने भौरङ्गजेव कौ मखो से सिं भिलाकर क्म, महाराज कतो लनं पड छि यह्‌ बात सुन षण मात्र के खिये भीरङ्धजेन की पकं सुक गदे | सुद उपरञन्त ीर्ज्ुजेव से महारालने गत्‌ राच्रिकी उक्ष दुै- टमा फा सविस्तर वणेन किया ! इसके समाद्र होने परं भीरट्ूभेव ने कद, - “जय फोल्वार स्वय दख दघंटनः को जांच कर कष्ट, तन भाश है, कि भवथेष भप

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भट) ` १९

र्थी भौ" पकठे न्ाकर दरु पायेगे 1 अच्छा, संहार | आपके फिलने पुन ६?”

यशवन्तसिहट-- तीन

जीरङूजेव - उनके नाम कया सौर उनमें ज्येष्ठ षन रहै?

यशदन्तखिद-उनकेि नाम है,-पथ्वीखिष्ट जगति केर दलस्तम्प्नसिह ! प्थ्यीस्िह च्येठरहैः दसो लिये युव प््न-पद्‌ मं चरित ष्ृए दहै

सौरे -भग्था है, कि प्रयोजन उपस्थित एने

पर एण्वोत्ति्ध अपने राज्य च्छा शाघन-फाय्ये अच्डी तस्ट चे!

' सुशवन्तखिए--सचाट्‌ फे एन पभ्रक्नो का उदेश्य भं समक नें सको हू 1

भौरद्गनेव- भेर एन ग्रघ्नौ कौ उद्य यह हैमहाराल!{ कि काल्युर सें व्रगावत उत्पन्न हुदै हे जौर उमे मिटा शांति स्थापित करने के चिप जापयौ फावुख की सूवेदग्रो दी जायेगी ! सीः लिये आपको ने मारवाड चेदुखाया दै!

यशवन्नसिह् - हज्‌र।

सीरङ्जेध--क्य्ये ?

यशवन्तसिह- इजूर अफगनिस्तष्न शी राजान कादुख यप से यष्ुत दुर अटक पार 2 मैरे शरीर ओर मनकी लैसौ अवस्था है, उ्षस्ति जय भं पतनी दीष धृष कर शान्तिपूर्वक चर वैठना अधिक चन्द कर्ताहं दस फाम के चयि कोड दूसरा मटुण्प क्यो घुना जाये

अौीरदुजेव-- हस दविपय परभ जच्डी सरह- विचार छर चुका \ सषाम के ्डिये सुरे अप षी अधिक

0 0 0

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0 वेद्राचिक काण्ड

पयुक्तं दिख देते है 1 जाप जपते ज्येष्ठ पुत्र एथ्वीसिंह को राल्य-काय्पंसौपयचाखम्भव शीघ्र कालु सी याना फरं यशवन्तसिह ~- हलूर !{ मेरा स्वारुप्य. ठीक नहः समय ससय परमे रोगाक्नान्त द्ुजा करता ष्टु अौरद्धभेष--फाबुन् का ज-वा ओर साद्य अतौष स्वारूथ्यम्रद्‌ है भाप चैद्य आपके खाय रहगे, उनकी खचिकित्साके गुणस रोग आपको ठयया पट्ुधा सक्तेगे। यशवन्तखिट--अपने इस व्यं मे, हजुर { धर छोढ इतनी दूर जाना सौर रहन मुर स्स तरह यो युक्तिखद्ुत जान नही पत्ता जौरन्नुजेव--भाप अपना मह जीर कनिष्ठ राजक्ु- मारो फो अपने साधसे जादये यष्ठ लोग अरपके साधं जहए र्हंग, यह भाषण चर जेखाः संख नसिखेगा | यशवन्तसिष्-क्या यान्ास्तिमेरो छिसी तरहं भी रक्षा षौ नहीं खकतौ, हञुरः? भीरङ्गजेव--( सक्ष स्वर से) ची तरह र्ता हे सती है, कि भाप इसि अस्दौकार करर) भीरद्धजेव की यद वात सुन व्ययित अर चिन्तित मारवाड ने शिर कूका लखिया। वह जान्तेये, कि लोौरद्गजेष षौ आप्ता जस्वोकष्र्‌ करने कए रख, भीषण युद है भहा युद फिय चाहते ये; कालल भी वाप्या चाषतेये बह चा्तेये, कि किरी सुन्दर टङ्क खे पष्वष्ल तयौ जाये ' जिख समय महाराज शिर शूकाये यह चिन्ता कर्‌ रदे धे, उस समय दण्द जीरङ्गजेघ उस द्रष्टिसि देख रहए या, जिख दुष्ट से ठ्याघ्न जपने पके से द्बे आगसेद कौ विफलता देखत &

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| भर) २१ ------------------------------------- ~ अन्त में महाराजे शिर उठाया) मारवाड भोर रष्ठौरो के मङ्ख के लिये उन्होने छाल अनिच्छा होने पर भो काथुल राला रियर फिया। भौरद्नेष-कदिये, अग्प का क्या उत्तर है! यशवन्तसिहु-मेरा भौर स्या उत्तर हौ सकता &, इङ्‌९ 1 अगपक्रा जव इतना भनुतेध है, तत्र उररी रक्ता करना मेण फतेव्य है] . आओरद्भेष-भाप का यह उत्तर सुने अतीव सन्तुष्ट जा हू भाप यथासम्भव शीघ्र कादु्त की याच्ना करे यथवन्तसिह-सम्भवनः; कल या परसो हीमे यहासे भारवाष्ुकौ यात्रा करूगए | वर पष्कुव रृय्वीचिह णो रज-काय्यै दे अपने महल अीर दौनो कनिष्ठ पुत्रके साय काबुल कौ यात्रा करेगा भीरद्गजेव-एेसप षौ कौशिये कवल कौ मूयेद्गरी की सनद्‌ जौर अन्यान्य अग्वध्र्रक्‌ काग्ज कठ भ्रात काल जापक पास पहुंच जायेभे। कठ हौ भापके स्य कादुल जारे वाली शाही फैल भौ तथ्यार च्म जायेगी खूब यड साया | आपे एरु शिकायत है, महाराज | यशथवन्तसि ह-( अत्यन्त चिन्तित ष्टो) कौ शिका यत, हूर ? जौरद्रजेव-अग्ज प्रात काट जाप कफे सिनत्र सरदार छम्पायत सुक्न्दद्‌प्स ने मेरे भेजे एक अहदी का घ्र ऊप- सान पिया दहे) यश्ववन्तसि ल-कसे, इुङूर ? सीरन्गजेर-कल र्त जाप पर भाकमण हौने भीर सुक्न्ददास ® एकाएक भा जाने फौ वज्‌ आप के रक्षा

वेश्च।चिक्र काण्ड

पप्ने का समा्वार शय र्भेने पाया, तवस चटनारासवि- स्तार विवरण सुङन्ददाख कि मह से खनने लिये, उसे दुाने ल्िये उख्के पाख जप्रना एक अदद मेज) यशवन्तखिह-- फिर क्या हभ, लहापनाह छरीरदूजेव- महदी ने लोट सुरे मुकुन्ददास का दिया जा च्डा ही वा्हियात एरु उत्त८ खन्या अदौ से मुकन्ददषसने कहा या) फिवह्‌ मेरा नौकर नहीं; इस- दिये उसक्रो भेरे घुलाने की छोर परवन्ह्‌ नहो यष््'भी कहा था, छि वह वौ पुरुप है जीर वीर युष्य किसी का भो भय किया नही कस्ते 1 जग्पष्ो देख फि मुञुन्द्‌ की यष च्च्र करैमी वातत दे यशवनत्तसि ह~-मुम्हे घटन की उव्र नष} एषठ रात उख घटना के वाद्‌ सुक्ुन्द्‌ मेरे मफान से भमने मकान यथे तय से अव तक उनसे भेरी भेट नीं हुदै है \ सेरौ सममः मे अदी ने सपनो कस्मि बात से मुसुन्द्‌ को चत्त जित किय होगा इसी से मुकुन्द्‌ मे यष्ट वाते सही होगी। आप जानते हे, हू षि यह अशिक्तित जयव् घरखिष्ट- कौर कस्पावत जापका केवल द्ग्सदष्हौ नही, द्ाखानुदुास है; रेसौ अवस्थाने सुम्हेमूणे चिश्वग्छ है, पि अश्व अपनी सद्िष्णुता भौर क्षमा-गुण से उस निरक्षर मनुष्यं कष श्न सूखेता कौ वातो का ध्यगन करेगे ~ येशे खमयं यशवन्तसिद्ध के खमीप वैडे एक ममलमःन सुताददिव ने कहा,“ लीजिये { आपके घौर कङूप्रावत्‌ सण्प हौ यष जा गये 1 खचसुच एर सुङ्न्द्द्रख स्मौरल्मुजेध के सामने वहा षो खछामं छर रद्र या | -खलाम फरने के उपरपन्त भौर.

न्न

अर २३

दने के खामनेसे मुर्कुन्द्‌ने हटने का लैखेदही यत किया, येद जीरङ्जेथ ने अत्यभ्त ककण स्वर से रहा,- °भुकुन्द | भाजत्ूने बष्ठा अपराध फिया है|? मुणुन्द्‌--(हंख षर) लानपष्तादहै, किं आप कफे सदु ने जापक कान सव भरे &ह। भीरद्घजेव--( क्रोध से भधर ही) मुश्ुन्द्‌ [ तुर षरि, कित्‌ कहां है ?.ओीर छिस वातं कर रहाई३? सुन्द में वेखपर नष्टो, इन खय घातो फी सुरे खबर ष! भापयष् वताय) कि जापकार्भनेष्पाअपराध क्यार? जीरद्जेष--अाज प्रता मेरे भद्दी ने तुभे लशं मेरे पास साने के लिये कहा, तव ठससेत्ं ने ग्रत्युत्तर सें क्या यष्टु नही कहा) कितूमेरा नौकर नही भीर मुक सै भयमी नरी करता; इसल्ये मेरे पास येया? भुकुन्द -- खनिये, जहापनाह | न्याय करना, तौ म्म सोढं मेरी वातं सुन्ि। भ्पने लिख तरह भने महदीं फी धातं खनी, ठंखी तरहं अवं मेरौ भो बात खनिये। धीरडुजेव फोट सात कह मुकुन्दं की घास खनने छे लिये उच्केसुद् री शरोर देखने छगा।, शुकन्द्‌~-- रात जाग भीर कट-रातनि के क्ि-जछ मं भीग, अहनि फे खनीपमे मारवा चे दिक्ली ह्ुचा महाराज के प्रादे एक दुधैटना' दो लाने फी - वैज दिद्ली पहुंचने पर भी ञ्च चिश्रामं रूरन सण्ा; पिर सात क्ती अवते मकान सा ने चिश्रा्न किय कठिनता 8 तीन चार चण्टे विश्राम फर्‌ खक था, रसे समय ञश्ध अष्टदीने जासु योर निद्रासि उमाया भौर पं फी भन्ता खना | मेने अपनी चशूवट का हष्ठ कष

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१५९ पशचाचि-क काण्ड

विधियो िगििेदिििििकििििेििििष णिषं 1) कनि

भषहदी से कषा, कि भे कछ समय उपरान्त श्वसषदट्‌ की सेवा सं उपस्थित होक्तगा मेरी यह बात छन वहु मुष पर बहुत क्दुद्धा वाखा, छि तम यदि इख तस्हन ष्वलोगे तेष वयि. जाकर खुखाट्‌ फी खेवा पटुंचाये जाभोगे। दस पर्‌ मूके भो कोच जाया जीरखउस चे भने फा) कि मे स्खादट्‌ का नौकर नष्टं, उनफे पासमं जाक्तगा। मेसो यह्‌ वत खन अहरौ ने फर, क्रि तुम्ह्सये यष वात्‌ सव सम्राट्‌ खुनेगे, तव तुम्ढारी गरदन कटवा लगे शसं पर खख मे नने कष्ण, कि च्निय हु, गरद्न कटने भये भौतष्ो नहीं सकता इसके उपरते मे सोने खगा, सदी ब्त कुक वक कक मेरे पस क्षि चला जाया 1 सव खे कोई दर चरटा पदे चेरी नीद शुखौ है छष्या परि त्याग करते भेजे आपक्मीसेवा मे खपर््थितं हीने ची तय्पारी की अरे यथादन्भव उर्द्‌ भापकी सेवसे उपस्थित दुभा हरू | मरुत--्टना पखीद्ी हि, अव साप बताये, कि एस भेने कितना सरराध किया हैः भोरद्भञेध--( कख नम रो ) तुम अदी का तिरस्कार करते) उसखेक्ुहुष्टौ तुमने मेसा तिरस्कार कयो किया? सम्टन्द्‌--हूज्‌र) ऊष्प कए तिरर्कषर करने कच्छी क्षमता सभतम नहो, भाप का तिरस्कार या ता भगवान्‌ कर सकते दै यासे रोग कर्‌ खकपते है, जिनमे भाप जैसे महा. शक्ति दम्पन्त भार्त-ख्खाद्‌ से टक्कर छने शी क्षमता ₹। सप्र का जह्दौी वष्णष्ीदुष्टहै, षछी षयि ञापको दख मनोमाखन्म का कंश सोषूार एरना पडा रै | जीर्द्रभेव - मुकुन्द 1 एदर्त, सन्दे नही, कि तम सदे घोरदो+वोरम षते वो सेरे खप्नने देखी वाते सत

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हैव रक्षा। " ९५

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छने फा साहसं करते | मुङ्न्द~--षुकर | अषछाष्टो, तो जापक लाभ खिये लापो एक आवश्यक सूचनाद्‌दू्‌। भीरद्गुजैब- कैसी सूचना सु्न्द-यह घात खद याद्‌ रखिये, कि शो दग्णपूत ट, चष्ट वीर है ओर जो भवीर है, वह राजपूत नहीं भीर ङ्गनेव- (मन षी मन कष्षाकर ) अच्छा; मुङन्द्‌ 1 यदि समसे तम्हष्रे चीरत्यकफा फोषे प्रमाण सांगा जाये सो ष्ष्या त॒म चसे दे सकोगे! सु्न्द- ( भपनी सचन भूषो अरर चटी दै खचन दृष्टी पर्य फेर फर) यह भी कोद पूजने कोवात रहै? यदि भे भपने वीरत्व काप्रमाण दैन सक्गा, तो पने को राजपूत भमान्‌गा) यशदन्तसिह-( भपनी जगह खड होकर ) वस हूर ! ध्हुत हुदै ! जो मनुष्य रेख घातं करता है, उख मनुष्य का भायण--दूष क्षम्तव्य है सीर्डुजेव- नही, महराज { भप एसर्मे दष भाप हा सुङन्दद्ासख ! ष्वा तुम अपने बीरस्व षता प्रमाण देने छे चखिये भ्रस्तुतष्हौ! ` सुषुन्द्--ष्जार वार पूचियेगा, तव भौ यही उच्चर पाष्टयेग, फिट भ्रस्त॒तदह्‌। कीरद्गजेय--यदि यह वति, तो फल सीसर प्र -भच्ेषडे भे उतर मेरे शेर से सामना फरो शुष्न्द्‌ यस दरीरद्धञेय-निरस्तर टो सासन फरना प्र्ेगा सुक्न्द्‌- -आओीरमोी पः ;

२६ चेदाचिक काण्ड।

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उीरङ्जेन- तुम्हपरे खिये इतना ही यवेष्टदहै; बोलो तुम तीसरे पहर निर्ख दौमर शेरसे सपसना करना स्वीकार है? अघ महाराजे यशवन्तसिंह निधिन्त र्द सं सके भौरन्घजेव कौ जाता कए कोद